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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 301 of 519

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Page 301

२०० स्पन्दकारिका
लुप्ते = लुप्त हो जाने पर । अबुधः = तत्त्वावबोधशून्य ।
विलुप्तोऽस्मि इति प्रतिपद्यते—'मैं नहीं हूँ' इस प्रकार भाव-वैलक्षण्य के कारण
तो वस्तु का परिच्छेद (विभाजन) ही हो जाएगा । (मैं लुप्त हो गया हूँ—ऐसा समझना
चाहिए ।)
यह स्वयंसिद्ध आत्मा तो स्वसिद्ध है अतः उसका अभाव कैसे संभव है? 'सिद्धः
कथं निषेधस्य विषयः स्यात् ?'
जिस प्रकार घर में स्थित किसी व्यक्ति को 'ऐ देवदत्त'—ऐसा कहकर बुलाया
जाय तो वह आत्मा का अपह्नव (अनात्मभाव) करने वाले व्यक्ति से कह सकता है कि
'मैं देवदत्त नहीं हूँ' क्योंकि आत्मा देवदत्त नहीं है और न तो किसी आत्मा का नाम ही
देवदत्त हो सकता है । वह यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं हूँ' किन्तु वह आत्मा की
दृष्टि से यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' ।
अभाव समाधि आदि अवस्थाओं में कार्य के अभाव के कारण तथा इन्द्रियों के
व्यापार के रुक जाने से 'आत्मभाव प्राप्त हो गया' इस प्रकार का प्रत्यय मात्र भ्रान्ति है
सत्य नहीं है तथा इन्द्रियों के न रहने से यह मानना कि—'आत्मा का अभाव हो गया
है'—भ्रान्ति है—'अभावसमाध्यवस्थासु कार्याभावात् करणव्यापारविरतिमात्रेणात्माभाव-
प्रत्ययो भ्रान्तिरेवेति ॥'१
कारिकाकार ने (१) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' एवं (२) अन्तर्मुख भाव' दोनों की
तुलनात्मक व्याख्या की है—
(१) कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १५ ॥
(२) म तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ॥ १६ ॥
(अन्तर्मुख = अहं प्रत्यवमर्श के रूप में स्पन्दायमान)
'कार्योन्मुख प्रयत्न' : 'तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥
'अन्तर्मुख भाव' : 'तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥' (यहाँ किसी
अन्य का अस्तित्त्व भी संभव नहीं होता—'अन्यस्य अनुपलंभनात्')
अन्तर्मुखीन स्थिति में कार्यों का अभाव होता है अतः वहाँ कार्योन्मुख प्रयत्न
संभव ही नहीं है । अन्तर्मुखता की स्थिति में कार्य तो नहीं किन्तु 'भाव' तो रहता ही है ।
इसीलिए कारिकाकार ने 'कार्य' के साथ 'प्रयत्न' एवं कर्तृता (अन्तर्मुखता) के साथ
'भाव' शब्दों का प्रयोग किया है । 'प्रयत्न' स्वाभाविक नहीं कृत्रिम होता है किन्तु आत्मा
की क्रियात्मकता प्रयत्न नहीं स्वाभाविक होती है ।
समाधिगत अनुभूतियाँ
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं कि—समाधिकाल में केवल इतना हो जाता है
कि कार्य सिद्ध करने की जो क्षमता इन्द्रियों में होती है और उसके माध्यम से वे शब्द-
१. 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य) ।