स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः १९९
किया जा सकता है कि कोई भी ज्ञान या अनुभव क्या आत्मा (या अपनेपन) के अभाव
में संभव है यदि संभव है तो आत्मा का अभाव माना जा सकता है अन्यथा नहीं ।
लेकिन इस उदाहरण में भी 'ज्ञाता' का अस्तित्व आवश्यक है। अतः आत्मा के अभाव
के होते हुए भी उसके अभाव का ज्ञान किसे होगा ?१
यदि पदार्थमयं जगत् (Objective world) के प्रति कार्योन्मुख प्रयत्न का लोप
होने पर आभ्यन्तरिक स्वस्वभाव (Inward nature) का भी लोप मान लिया जाए तो
आगामी समय में अन्य प्रयत्न का अवबोध या ज्ञान (Perception) संभव नहीं होगा
और परिणामस्वरूप अन्य प्रयत्न का भी ज्ञानाभाव हो जाएगा।
इसके अतिरिक्त यह भी कि, कोई भी मूर्ख व्यक्ति भला स्वप्न-शून्य प्रगाढ़ निद्रा
में (सुषुप्ति के समय) बहिर्गामिनी शक्ति के अबोध (Non perception) द्वारा
अन्तर्मुखी अनुभूति के लुप्त होने की शङ्का, यह जानते हुए भी कि एक चीज को लुप्त
होना किसी दूसरी वस्तु को प्रभावित नहीं कर सकता, कैसे कर सकता है?२
ज्ञाता की लुप्तता (Disappearance) संभव नहीं है। इस पादार्थिक जगत् के
प्रति उन्मुख कार्यों की अनुपस्थिति या अनुपस्थिति की अभिव्यक्ति के द्वारा, प्रकाश से
अभिन्न एवं अन्तरोन्मुखी ज्ञाता की लुप्तता संभव नहीं है । अन्तर्मुखी स्वभाव
(Inward faced nature), जो कि सर्वज्ञता के गुण के मूल स्थान का निर्धारण करता
है,—अभाव (अनुपस्थिति) की दशा को भी जानता है क्योंकि अन्यथा वह दशा
अस्तित्व में रह ही नहीं सकती। 'अन्तर्मुखी' शब्द बाह्यपदार्थता (Objectivity) को
आत्म चैतन्य (Subjectivity) से पृथक् करता है। दोनों परस्पर विरोधी भाव है।
'अन्तर्मुखी' का अर्थ है—वह जिसमें पराहंता (Supreme egaity) अधिपत्य
रखती हे। ज्ञाता ही सत्य है, ज्ञेय तो उसका विषय है।३
इसीलिए कहा गया है—
न तु योऽन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्व गुणास्पदम् ।
तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥
कार्ये = निर्मेय वेद्य या वस्तु में ।
उन्मुखः = संमुखीभूत । उसके संपदनार्थ प्रवण ।
यः प्रयत्नः = जो प्रयास । कर्तृत्व, सहज उत्साह ।
स केवलं = वह मात्र । यही परमकारण या व्यापार का हेतु है ।
क्योंकि उस दशा में स्थूलरूप कार्य के अभाव से ।
लुप्यते = लुप्त हो जाता है । अनभिव्यक्त रूप में आत्मा में ही अमुख्य विलुप्तोस्मि
= मैं लुप्त हो चुका हूँ। प्रतिपद्यते = समझता है । बनकर अवस्थित रहता है।
**तस्मिन्—**उसमें । उस प्रयत्न में । (उस प्रयत्न में तत्काल ही) ।
१-३. स्पन्दनिर्णय ।