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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 241 of 519

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Page 241

१४० स्पन्दकारिका
अन्तरात्मा की रंगभूमि पर विश्वाभिनय—पतिभूमिका में प्रतिष्ठित विश्वात्मा एवं
पशुभूमिका में प्रतिष्ठित जीवात्मा (पशुपति एवं पशु) एक ही सत्ता के दो रूप हैं—१.
पूर्ण स्वतन्त्र २. संकुचित स्वातन्त्र्योपहित ये ही इसके दो रूप हैं । 'रंगोऽन्तरात्मा' एवं
'नर्तक आत्मा' कहकर शिवसूत्रकार ने पशुपति को विश्व रूपी महानाट्य का अभिनेता
कहा है । परप्रमाता की नाट्यलीला ही विश्व एवं उसकी सृष्टि है । विश्वरूप महानाट्य का
अभिनय करने के लिए यह नाटककार अपनी 'शिव' निर्बंध 'स्वातन्त्र्य शक्ति' को 'माया
शक्ति' का स्वरूप प्रदान करके, पूर्ण स्वतन्त्र होते हुए भी स्वात्मविस्मृति रूप अख्याति
को धारण करने में 'मितस्वतन्त्र' पशु बनकर, अपनी चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान, क्रिया
की महती शक्तियों को पञ्चकञ्चुकों में रूपान्तरित करके, असीमता, सर्वज्ञता,
सर्वव्यापकता, सर्वकर्तृत्ता आदि को स्वेच्छया भुलाकर, ससीम, अल्पज्ञ आदि बनकर,
सर्वशक्तिमान से 'शक्तिदरिद्री' बनकर, पशुपति से पशु बनकर आरोहण भूमिका से
अवरोहण भूमिका में पदार्पण करके स्वात्मभित्ति के दर्पणस्वरूप रंगमंच पर विश्वमयता के
अवभासन के रूप में विश्वनाट्य का मुकुरनगरवत् अभिनय करता है ।
अभिनेता शिव का विश्वाभिनय—शिव की 'आनन्दशक्ति' के द्वारा ही विश्वो-
ल्लासन होता है अतः विश्व अनन्त आनन्दामृत का उच्छलन है । वही शिव अभेदव्याप्ति
को छिपाकर भेद व्याप्ति ग्रहण कर लेता है, शिव होकर भी, विश्वनाट्य के रंगमंच पर,
जीव बन जाता है । मुक्त होकर भी वह बद्ध बन जाता है । यह 'अशुद्धि' 'क्षोभ'
'अख्याति' 'स्वरूपगोपन' 'आत्मविस्मृति' अवभास अवरोहण' आदि नाटककार एवं नट
परमशिव का एक स्वेच्छाभिनीत अभिनय है । शिव से धरणी पर्यन्त वही विश्वोत्तीर्ण एवं
विश्वात्मक शिव ग्राह्य, ग्राहक आदि अनेक आकारों में अवभासित होकर स्फुरित है उसके
अतिरिक्त अन्य कोई है ही नहीं—
'भगवान्विश्वशरीरः' 'श्री परमशिवः स्वात्मैक्येन स्थितं विश्वं' 'श्रीमत्परमशिवस्य
पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशैकघनस्य एवंविधमेव शिवादि धरण्यन्तं
अखिलं अभेदेनैव स्फुरति, न तु वस्तुतः अन्यत् किञ्चित् ग्राह्यं ग्राहकं वा, अपितु श्री
परमशिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्रैः स्फुरति ।।' (प्र०ह०सू० ३) ॥
वही शिव भी है और वही पशु भी है । जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी स्वेच्छा से
अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' द्वारा अपनी अभेद व्याप्ति को निमज्जित करके और भेद व्याप्ति
को ग्रहण करके और अपनी अनन्त व्यापक शक्तियों को संकुचित करके पशुभूमिका पर
अभिनय करने लगता है तो वही मलावृत्त संसारी कहलाने लगता है—
'चिद्वत्तच्छक्तिसंकोचात् मलावृत्तः संसारी ।' (प्र०ह० ९)
आचार्य क्षेमराज इसी तथ्य को अपने शब्दों में इस प्रकार कहते हैं—
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं निमज्जय भेदव्याप्तिम् अव-
लम्बते तदा तदीया इच्छादिशक्तयः असंकुचित अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च
अयं मलावृत्तः संसारी भवति ।' इसके परिणामस्वरूप—
क) इच्छाशक्ति—(संकुचित होकर) अपूर्णम्मन्यता रूप 'आणवमल'