Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 242 of 519

Read in context
Page 242

ख) ज्ञानशक्ति—(संकुचित होकर) सर्वज्ञत्व से अल्पज्ञत्व रूप, एवं सङ्कोच-ग्रहण
से संकुचित बनकर 'मायीयमल' बन जाती है ।
ग) क्रियाशक्ति—(संकुचित होकर) अल्पकर्तृत्व बनकर 'कार्ममल' बन जाती है।
इस प्रकार—
सर्वकर्तृत्व, सर्वज्ञत्व, पूर्णत्व, नित्यत्व, व्यापकत्व शक्तियाँ संकुचित होकर 'कला'
'विद्या' 'राग' 'काल' एवं 'नियति' बन जाती है। श्री सर्वस्वतन्त्र आत्मा शिव संसारी
(पशु) बन जाता है। 'शक्तिदरिद्रः संसारी उच्यते, स्वशक्तिविकासे तु शिव एव ।।' ('प्रत्य-
भिज्ञाहृदयम्' सूत्र ९ क्षेमराज)
'अशुद्धि'—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य' में अशुद्धि क्या है और शिव की सामर्थ्य
(स्वातन्त्र्य शक्ति) क्या है ?
स्वातन्त्र्यवाद—'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'आभासवाद' प्रत्यभिज्ञा की सृष्टि-दृष्टि की
व्याख्या के दो सिद्धान्त हैं। परप्रमाता की दृष्टि से तो 'स्वातन्त्र्यवाद' एवं 'प्रमेय' की
दृष्टि से 'आभासवाद' चरितार्थ है—ज्यादा संगत है—अधिक उपपन्न है।
'स्वातन्त्र्य' शिव की वह पराशक्ति है जो कि उससे अभिन्न है और जिसका अपर
पर्याय 'आनन्द' है। अति दुर्घटकारित्व इसी स्वातन्त्र्य की विशेषता है। यह शिव का
ऐश्वर्य है जो कि स्वातन्त्र्य से अपृथक् है। परमात्मा की इच्छा का निर्बाध, अप्रतिहत,
निर्बंध, एवं अविराम प्रसार उसका 'स्वातन्त्र्य' है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी' (१।१) में
कहा गया है—'स्वातन्त्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छा प्रसरस्य अविघातः ।'
यही स्वातन्त्र्य अति दुर्घटकारित्व का चमत्कार है—'एतदेव स्वातन्त्र्यं यदतिदुर्धट-
कारित्वम् ।'
स्वातन्त्र्य—परमात्मा के नित्योदित 'परावाक्' को उसका 'स्वातन्त्र्य' एवं 'ऐश्वर्य'
कहा गया है। यही विमर्शात्मा चिति भी है। शब्दतत्त्व (परावाक्) सृष्टि के प्रसार की
आदि कोटि एवं सृष्टि-सङ्कोच की चरम कोटि है। शिव ही प्रकाशात्मा चिति हैं। दोनों
अविनाभूत हैं। अविभक्त (अन्तर्लीन) विमर्शात्मक शिव 'परमशिव' कहलाते हैं और यह
उनकी निष्कल अवस्था है।
'चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा' ('शिवदृष्टि') प्रकाशविमर्शात्मक संवि-
त्स्वरूप भगवान् परमशिव अपनी इसी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' से रुद्रादिक प्रमाता एवं
नीलसुखादिक प्रमेयों के रूप में प्रकाशित होते हैं। यद्यपि शिव का यह अवभासन
अनतिरिक्त है तथापि अतिरिक्तवत् आभासित होता है। इस अवस्था में शिवस्वरूप
आच्छादित नहीं होता। यही है संवित्स्वरूप शिव के स्वातन्त्र्य की महत्ता।
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी' में कहा गया है—'तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाश-
विमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातन्त्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया
नीलसुखादिप्रमेयरूपतया च अनतिरिक्तायापि अतिरिक्तयेव स्वरूपानाच्छादिकया संवि-
त्स्वरूप नान्तरीयक स्वातन्त्र्य महिम्ना प्रकाशते इत्ययं 'स्वातन्त्र्यवादः' प्रोन्मीलितः ॥'