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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 240 of 519

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Page 240

प्रथमः निष्यन्दः १३९
अणु और शिव में कोई भेद नहीं है तो यह अणु शिव ही क्यों नही बन जाता उसके
समान ('पुरुषस्तत्समो भवेत्') क्यों बनता है? पतिप्रमाता एवं पशुप्रमाता में तात्त्विक
भेद तो नहीं है किन्तु फिर दोनों में भेदाभास होता क्यों है ?
क्षोभ और अशुद्धि—सूत्रकार इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि अपने 'स्वातन्त्र्य'
से उत्पादित सहज अशुद्धि (मल) के द्वारा असमर्थ बने हुए एवं संसार की वासनात्मक
अभिलाषाओं में फँसे हुए मितप्रमाता (पशुप्रमाता) का 'क्षोभ' जब स्वस्वरूप में ही
लयीभूत हो जाए तब उसे 'परमपद' की प्राप्ति होती है। भट्टकल्लट का कथन है—
१. मितप्रमाता को आत्मबल का पूर्ण स्पर्श होने ही नहीं पाता क्योंकि वह वासना-
त्मक अभिलाषाओं के चक्रव्यूह में फँसा रहता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता
है क्योंकि स्वभाव से उत्पन्न अशुद्धि (मल) द्वारा प्रमाता ओत-प्रोत रहता है।
२. देहादिक अनात्म पदार्थों में 'अहं'—इत्याकारक अभिमान, से जात विकल्प
परम्परा ही 'क्षोभ' है। यही 'क्षोभ' मालिन्य, मल, अज्ञान एवं अशुद्धि है। इस क्षोभ के
स्वस्वरूप में लय हो जाने पर तब प्रमाता को 'परमपद' की प्राप्ति हो जाती है।
३. 'परमपद' का प्रतिबन्धक कौन है? 'क्षोभ' ही प्रतिबन्धक है। विद्वानों ने स्पन्द
सूत्र में प्रयुक्त 'अशुद्धि' 'कर्तव्याभिलाषा' 'क्षोभ' इन तीनों का अर्थ लिया है—'आणव
मल' 'कार्य मल' एवं 'मायीय मल'। 'अशुद्धि' = आणव मल। 'कर्तव्य' = कार्ममल
'क्षोभ' = मायीय मल।
अशुद्धि क्या है? 'देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादि रूप मल'—रामकण्ठाचार्य
क्षोभ क्या है? 'प्रतिनियत शरीराद्यालम्बनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उपप्लवः।'
—रामकण्ठाचार्य।
अशुद्धि किसे कहते हैं? 'अनादिर्याऽशुद्धिरविद्याऽविवेकमूला भोगाभिलाषमलंरूप'
—उत्पलदेव।
क्षोभ किसे कहते हैं? 'क्षोभो विकारोऽशुद्धिजनितो देहाहम्प्रत्ययरूपो।'
—उत्पलदेवाचार्य।
'अभिमानात्मकक्षोभ'—उत्पलदेवाचार्य।
इसी क्षोभ के निलीन हो जाने पर 'परमपद' की प्राप्ति होती है। यह 'परमपद'
क्या है? रामकण्ठाचार्य कहते हैं—'प्रलीन देहाद्यहंप्रत्ययलक्षणक्षोभो निवातनिश्छल
जलधिवत सुप्रशान्त स्थितिः आत्मैव परमपद शब्द प्रतिपादितः।।'—रामकण्ठाचार्य॥
'परमपद' = 'निरुत्तर स्थान'—रामकण्ठाचार्य।
भट्टकल्लट इस स्पन्दसूत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं—
'स चास्य आत्मबलस्पर्शः सहजया अशुद्ध्या व्याप्तस्य कार्यमिच्छतोऽपि न
भवति, किन्तु यदा क्षोभः 'अहमिति' प्रत्ययभावरूपोऽस्य प्रलीयेत्, तदास्य भवति परमे
पदे प्रतिष्ठानम्।'