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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 239 of 519

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Page 239

१३८ स्पन्दकारिका
अर्थात् जब कृत्रिम आलम्बनों से मुक्त होकर स्वाभाविक अहं प्रत्यय के सूर्यालोक से क्षोभ
रूपी प्रालेयपटल (हिमसंतति) विगलित हो जाती है—तब निरुत्तर ('परम') स्थान
सद्भाव के द्वारा प्रकाशित हो उठता है ।
तात्पर्य यह है कि आत्मा एवं पुरुष में तथा पर एवं अपर संवित् तत्त्वों में
अभेदावस्था अधिकाधिक संवर्द्धित होती रहे । भाव यह कि स्वस्वभाव में प्रतिष्ठान हो
और अभेदापत्ति हो—
'अभेदः ... ... ... ... ... स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम्' ।—
अशुद्धिः = भिन्नभिन्न दर्शनों में पुरुष की भिन्न-भिन्न अशुद्धियों का उल्लेख किया
गया है ।
इस प्रकरण में तो अचित्स्वरूप, अनित्य एवं परतन्त्र देहादिक आत्मेतर पदार्थों में
जो भ्रमात्मक अहंप्रत्यय प्रवर्तित होता है अतः उनके विगलित होने पर स्वस्वभावाभि-
व्यक्तिलक्षणा परा शुद्धि प्राप्त हो जाती है । कहा भी गया है—
'जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे,
प्राप्तैकध्ये निर्मले बोधसिन्धौ ।
अव्यावर्त्येन्द्रियग्राममत्त,
विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽभासि ॥'
यह भी कहा गया है—
'नात्माधीनत्वेऽपि विश्वं नियोक्तुं,
सर्वो हस्तादीनिवेष्टे यथेष्टम् ।
बालो राजेवात्मशक्त्यप्रबोधात्,
त्वय्यन्तःस्थे सर्वशक्तिस्तु सर्वः ॥'१
'यदोक्षोभः प्रलीयेत्'—जब देहादिक अहं प्रत्यय रूप क्षोभ लीन हो जाता है तब
आत्मा परमपद में प्रतिष्ठित हो जाती है ।'
'अशुद्धि' = देहाद्यात्मप्रतिपत्तिमूलरागादिरूपा' (रामकण्ठ) ।
अशुद्धि = मल । 'क्षोभ' = प्रतिनियत शरीराद्यालंबनाहंप्रत्ययात्मा मायीय उप-
प्लव' (रामकण्ठाचार्य) ॥ परमपद = निरुत्तर स्थान (रामकण्ठ) इस श्लोक में
स्वस्वभाव में प्रतिष्ठा का ही प्रतिपादन किया गया है—'स्वस्वभावे प्रतिष्ठानम् इति अनेन
श्लोकेन प्रतिपादितम् ॥ (रामकण्ठ) ॥
'अशुद्धि' = अचित्स्वरूपों में अनित्य वस्तुओं में (देहादि में) अहं प्रत्यय (राम-
कण्ठ) ।
क्षोभ की शान्ति से स्पन्दोपलब्धि का प्रतिपादन—आठवें स्पन्दसूत्र में कहा
गया था कि—'अपि त्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत्' यदि पशु एवं पशुपति में,
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' ।