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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 123 of 519

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Page 123

२२ स्पन्दकारिका
'उदय' है वही अहन्तारूपता का 'प्रलय' है और जो बहीरूपता का प्रलय है वही
अहन्तारूपता का 'उदय' है अतः 'प्रलयोऽपि उदयरूपः उदयोऽपि प्रलयपरमार्थः' इस
विषय में 'भेदाभेद प्राधान्येतरता कृतस्तु अत्र विवेकः ।' १ वस्तुतः चिदात्मा ही उस प्रकार
प्रकाशित होती है । यहाँ अक्रमता की बात कही गई है । २
'स्पन्दनिर्णय' में आचार्य क्षेमराज ने निमेष-उन्मेष की इस प्रकार व्याख्या की
है—'चिदानन्दघनस्य उन्मेषनिमेषाभ्यां स्वरूपोन्मीलननिमीलनाभ्यां मज्जनोन्मज्जने ।' ३
'उन्मेष-निमेष'—'उन्मीलन'-'निमीलन', मज्जन उन्मज्जन ।'
'स्पन्दसंदोह' में कहा गया है कि सदाशिवादिक्षितिपर्यन्त प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की
सत्ता संहारापेक्षा में 'निमेष' एवं सिसृक्षा की अपेक्षा से 'उन्मेष' कही जाती है—'सदा-
शिवादि क्षितिपर्यन्तस्य तत्त्वग्रामस्य प्राक्सृष्टस्य या संहारापेक्षया निमेषभूः सैव स्रक्ष्य-
माणभेदापेक्षया उन्मेषदशा ॥' ४
प्राक्सृष्ट तत्त्वग्राम की भेदसंहाररूपा जो 'निमेष' दशा है वही चिदभेदप्रथा 'उन्मेष'
कहलाती है 'प्राक्सृष्ट भेदसंहररूपा च या निमेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया उन्मेषभूः ।' ५
'भेदासूत्रण रूप जो 'उन्मेष दशा' है वही चिदभेद प्रथा की 'निमेष दशा' है—भेदा-
सूत्रणरूपा च या उन्मेषदशा सैव चिदभेदप्रथाया निमेषभूः ॥' ६ भेदासूत्रणात्मक दशा
'उन्मेष' है और चित्तत्व से अभिन्न दशा 'निमेष' है ।
आचार्य क्षेमराज का कथन है कि 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां...स्तुमः' श्लोक में
वसुगुप्त ने शिव के प्रथम सूत्र 'चैतन्यमात्मा' (१।१) की व्याख्या की है—क्षेमराज
कहते हैं—'तत्र आद्यमेव सूत्रं विमृश्यते ।' वे कहते हैं—परमाद्वय प्रकाशानन्दमय महेश्वर
स्वरूप प्रत्यभिज्ञापनाय—समस्त शास्त्रगर्भा समुचितां-स्तुतिम् इमाम् उपदिदेश श्रीमान्
वसुगुप्त गुरुः—'यस्योन्मेष... स्तुमः ।'
आचार्य क्षेमराज के उपर्युक्त कथन से यह भी सिद्ध होता है कि 'स्पन्दकारिका'
का प्रथम श्लोक वसुगुप्त-प्रणीत है अतः 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन वसुगुप्त ने ही किया
है । 'स्पन्दनिर्णय' में क्षेमराज कहते हैं कि वसुगुप्ताचार्य ने शिवसूत्रों की सामग्री के
आधार पर ही 'स्पन्दकारिका' का प्रणयन किया । इससे यह भी सिद्ध होता है कि
काश्मीरीय त्रिकनय में 'स्पन्ददर्शन' ही केन्द्र में है एवं 'स्पन्ददर्शन' का मूल ग्रन्थ
'शिवसूत्र' है तथा उसके अनन्तर स्पन्दशास्त्र का आद्यग्रन्थ 'स्पन्दकारिका' है ।
'शिवसूत्र' का प्रथम सूत्र—'चैतन्यमत्मा' । ७
'स्पन्दकारिका' का प्रथम श्लोक—
'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥' ८
१-२. स्पन्दसन्दोह । ३. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' ।
४-६. स्पन्दसन्दोह । ७. शिवसूत्र ।
८. स्पन्दकारिका ।