स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २१
'त्रिक दर्शन' की मान्यता यह है कि 'सृष्टि' तो किसी ऐसी वस्तु की हो सकती है
जो कभी पूर्व में अस्तित्व में न रही हो । सृष्टि का अर्थ है—किसी नव्य वस्तु का जन्म ।
चूँकि 'शिव' एवं शक्ति से पृथक् कोई भी नव्य वस्तु कल्पित ही नहीं की जा सकती
क्योंकि शिव एवं शक्ति के अतिरिक्त अन्य की सत्ता ही नहीं है । अतः किसी भी पदार्थ
का जन्म संभव नहीं है । इसी दृष्टि से कारिकाकार ने सृष्टि एवं प्रलय को 'उन्मेष' एवं
'निमेष' कहा तथा 'सृष्टि' को सृष्टि न कहकर 'उदय' कहा । सूर्य का प्रतिदिन उदय तो
होता है किन्तु इस उदय को सूर्य का जन्म कोई नहीं कहता । किसी पूर्व विद्यमान किन्तु
तिरोहित वस्तु का प्रकाश में पुनः आना ही 'उदय' है । कारिकाकार ने 'संहार' न कहकर
'प्रलय' कहा क्योंकि 'संहार' विनाश का सूचक है । चूँकि 'शिव' एवं 'शक्ति' का संहार
संभव नहीं है अतः उनसे अभिन्न जगत् का भी संहार (विध्वंस । विनाश । सत्ता का
मूलोच्छेद) भी कभी संभव नहीं है । इन्हीं कारणों से कारिकाकार ने यहाँ 'प्रलय' शब्द का
प्रयोग किया जिसका अर्थ है—'प्रकृष्टेन लयः' 'कार्य' का 'कारण' में लय अर्थात् वस्तु
का बीजात्मना अवस्थन 'संहार' तो नहीं है किन्तु 'प्रलय' हो सकता है । 'प्रलय' संहार
एवं विनाश नहीं है प्रत्युत् अपने मूल में अवस्थान है ।
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कतिपय विद्वान् 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां' पदों की
व्याख्या इस प्रकार करते हैं—
(१) स्वस्वरूप-प्रकाशन = 'उन्मेष' : जगत् की सृष्टि
(२) स्वरूप-गोपन = 'निमेष' : जगत् का विनाश
अन्य विद्वान् (क्षेमराज के कथनानुसार) 'उन्मेष' एवं 'निमेष' को कादाचित्क
मानते हैं । वे कहते हैं कि 'उन्मेष-निमेष' की प्रथम व्याख्या संगत नहीं है क्योंकि
कादाचित्क जगत् के उदय एवं नाश के हेतु नित्य भगवान् में कैसे रह सकते हैं? अतः
जगत् के कारण के उन्मेष एवं निमेष धर्मक होने के कारण एक ही भगवच्छक्ति उन्मेष-
निमेष शब्दद्वय द्वारा व्यवहृत की जा सकती है । 'उन्मेष निमेष' = भगवच्छक्ति । अतः
उस शक्ति के 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' होता है एवं उस शक्ति के निमेष से प्रलय
होता है—
१. पराशक्ति का उन्मेष—जगत् का उदय ।
२. पराशक्ति का निमेष—जगत् का प्रलय ।
'स्पन्दसन्दोह' में क्षेमराज कहते हैं कि 'यह विभागरहित, एकात्मिका विमर्श भूमि
उन्मेषनिमेषामयी है और इसे उन्मेष-निमेष के नामों से पुकारा जाता है—'एवं इयं एका
एव अविभगा विमर्शभूमिः उन्मेषनिमेषमयी उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यामभिधीयत ॥१
यहाँ 'उन्मेष' एवं निमेषमय की, निमेष एवं उन्मेषम की—प्राधान्येतरताविभक्त
धरणी आदि सदाशिवान्त जगत् के प्रति प्रलयोदय हेतुत्व की व्याख्या की गई है ।२
'प्रलयोदयौ' = 'प्रलयौ च उदयौ च प्रलयोदयौ' २ ॥ नीलादिक की बहिरूपता जो
१. क्षेमराज—'स्पन्दनिर्णय' । २. 'स्पन्दसन्दोह' ।