Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 124 of 519

Read in context
Page 124

प्रथमः निष्यन्दः २३
अन्वेष्टव्य एवं अनुसंधेय बिन्दु तो यह है कि यदि 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्रों की
व्याख्या है तो क्या इन कारिकाओं में शिवसूत्रों की व्याख्या मिलती है ? यदि हाँ तो
किस प्रकार ?
इस 'स्वतन्त्र शिवाद्वय दर्शन' में एक ही पदार्थ में अनेकत्व की अनुस्यूतता
दिखाई गई है ।१ परमार्थवादानुसृत्या एक ही अर्थ का षट्त्रिंशत्तत्वमयतात्म अनेकार्थत्व
आम्नाय में वर्णित भी है । इस प्रकार की व्याख्या की जाने पर श्री स्वच्छन्दादि शास्त्रों में
परमेश्वर का जो पञ्चविधकृत्यकारित्व वर्णित हुआ है वह भी स्वीकृत, हो जाता है ।२
'उन्मेषनिमेष' शब्द मात्र का प्रयोग करके स्पन्दकार ने शिव के पञ्चविधकृत्यकारित्व की
ओर संकेत किया है । 'षडध्व' की दो प्रकार की सृष्टि होती है—
(१) भेदासूत्रणदुल्लासन रूप 'उन्मेष' के द्वारा ।
(२) किंचित्स्वरूप निमेष के द्वारा ।
'षडध्व' की उन्मेष-निमेष मय शुद्धा शुद्धरूपा सृष्टि दो प्रकार की होती है—जिसे
इस प्रकार व्याख्यात किया जा सकता है—'तथा उन्मेषनिमेषाभ्यां लोलीभूताभ्याम्
आभासमाना भासनपरमार्था स्थितिः'—कहा भी कहा गया है—
'... लोलीभूता परा स्थितिः ।'
स्वस्वरूप का निर्यादिभोगमय पूर्ण निमेष ही विलय है—'तथोत्पन्न स्वरूपोन्मेषा-
भासरूपो वस्तुतो निर्यादिभोगमयो यः पूर्णो निमेषः स्वस्वरूपस्य स विलयः ॥'३
जो सर्वात्मना पूर्णोन्मेष है वह अशेषभेदोपशम रूप एवं निमेषमय है और
अनुग्रहात्मक है । अतः परमेश्वर के पञ्चविधकृत्यकारित्व का प्रतिपादक है ।४ (निर्विकल्प-
सविकल्परूप उन्मेषण) संस्कार के विगलन से समस्त भेदों के नष्ट हो जाने पर जहाँ नष्ट
भेद का भी संस्कार नष्ट हो जाता है वह तादृश पूर्णोन्मेषात्मा है । सृष्टि-स्थिति-संहार-
विलय में अन्योन्य की संस्कारशेषता विद्यमान है । बिना अनुग्रह के वह दुरुच्छेद्या है ।
वही संसार का कारण भी है—वस्तुतः 'इत्थं प्रलयोदयौ अपि संगमनीयौ' अर्थात् प्रलय
एवं उदय भी तत्त्वतः ऐक्यात्मक है 'प्रलयादिकं च आभास्यनिष्ठं आभाससारमेव न तु
प्रकाशात्मनोऽस्य परमेश्वरस्य तत किंचित्' कहकर क्षेमराज कहते हैं कि—'अवस्थायुगलं
चात्र कार्यकर्तृत्व शब्दितम् । कार्यताक्षयिणी चात्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ।'५ परमात्मा का
कर्तृत्व अक्षय एवं शाश्वतिक वैभव है । माया-प्रमातृभूमि में भी प्रकाशात्मा परमेश्वर का
पञ्चविधकृत्यकारित्व सिद्ध है । इस प्रकार भगवान् का नील प्रकाशादि काल में नीलाभास
में देशकाल के संभिन्न होने से स्रष्ट्रिता है तथा देशकालाकान्तर संभिन्न होने की शंका
उठाने पर संहारत्व है ।६
(१) सृष्टि के पूर्व 'नीलाद्यभाससामान्य में स्थिति हेतुता है, वहीं अभेदाशसर्ग में
विलय हेतुता है ।
१-४. स्पन्दसन्दोह । ५. स्पन्दकारिका (कारिका १४) ।
६. स्पन्दसन्दोह ।