स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः ११
१. संबंध—ईश्वर एवं शास्त्र का कर्तृकार्यलक्षण संबंध है। शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य-
प्रतिपादकभावलक्षण ही संबंध है।
'स्तुमः' = स्तवन करते हैं। उपादेय वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन ही स्तुति का अर्थ
है। २. प्रयोजन क्या है? 'प्रयोजनं च आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शंकर पदादेव
अवसीयते ।।' अभिधेय-प्रयोजन में उपायोपेयभावलक्षणरूप संबंध है। इस शास्त्र का
अभिधान है—'स्पन्द' क्योंकि स्पन्दका० में 'स्पन्दतत्त्वविविक्तये' (१ नि० २१ का० २
पा०) कहा गया है।
स्पन्द का अर्थ क्या है?—'स्पन्द' का क्या अर्थ है? 'स्वस्वभावपरामर्शमात्र,
नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूत, तावन्मात्रसंरभात्मा 'शक्ति' नामवाली पारमेश्वरधर्म का
किंचिच्चलन ही 'स्पन्द' कहलाता है—'स्पन्दशब्दश्च अयं स्वस्वभाव परामर्शमात्रस्य,
नित्यस्य, शून्यताव्यतिरेचनकारणभूतस्य, तावन्मात्रसंरंभात्मनः शक्त्यपराभिधानस्य पारमे-
श्वरस्य धर्मस्य किंचिच्चलनात् 'स्पन्द' इति अर्थानुगमात् वाचकत्वेन व्यपदिष्टः ।।'
'स्पन्द' शास्त्र नाम क्यों पड़ा?—इसी स्पन्द तत्त्व के प्रतिपादन के कारण इस
शास्त्र का नाम 'स्पन्द' शब्द द्वारा व्यपदिष्ट है 'तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्द-
शब्देन अभिधीयते ।।'
स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है?—यहाँ स्पन्दशास्त्र का विषय क्या है? 'विशुद्ध-
श्रद्धा भक्ति प्रकर्ष पिशुनित परमेश्वर-परशक्तिपात-प्रोन्मील्यमानस्वभावालोक तिरस्कृत
सकलसंदेहान्धकारत्वात् प्रबुद्धः सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारो गुरुवचनचोदनामात्रावशेष-
स्वात्मैश्वर्योपलब्धिः'—यहाँ 'विषय' शब्द अधिकारी के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है न
कि प्रतिपाद्यविषय के अर्थ में। 'शंकर ही हमारी आत्मा है'—'स कथं शंकरो ममैव
आत्मा ?' इसका उत्तर द्वितीय कारिका में दिया गया है।
स्पन्दशास्त्र के ज्ञान का पात्र कौन है?—स्पन्दशास्त्र के उपदेश का पात्र कोई
विरला विवेकी व्यक्ति ही संभव है—
'किंत्वेतेऽद्य विवेकिनः कतिपये सन्त्यत्र पात्रं सताम्' ।। (रामकण्ठ)।
'स्पन्द' शाक्ततत्त्व है जो कि शंभु का स्वभावभूत आत्मधर्म है—
'निजो धर्मः शंभोरनुपमचमत्कार सरसः ।
परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।। (रामकण्ठ)।
'स्वरूपस्पन्द' शब्द की सोद्देश्यता—प्रथम निष्यन्द को 'स्वरूप स्पन्द' क्यों
कहा गया? कारण निम्नांकित हैं—१. 'स्पन्दकारिका' शिवसूत्र की ही व्याख्या होने के
कारण शिवसूत्र के मुख्य प्रतिपाद्य विषय ('आत्मा') की ही प्रतिपादक होनी चाहिए
क्योंकि तभी इसका उद्देश्य पूर्ण हो सकता है। २. 'स्पन्दकारिका' सर्वात्मवाद, सर्व-
स्पन्दवाद, सर्वशिववाद एवं सर्वशक्तिवाद का पोषक होने के कारण भी 'स्वरूप' (आत्मा
या शिव या चैतन्य) का प्रधानतया प्रतिपादन करता है। ३. स्पन्दशास्त्र मुख्यतः 'शक्ति'
को प्राधान्य देता है—'स्पन्द' को प्रामुख्य प्रदान करता है और 'स्पन्द' स्वातंत्र्य शक्ति