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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 113

१२ स्पन्दकारिका
(इच्छाशक्ति) परमात्मा की विमर्शशक्ति या उसके परमाद्भुत एवं परमचमत्कार ऐश्वर्य
(स्पन्द = आत्मस्वभाव = 'स्वस्वरूप') का अभिधानान्तर है । ४. 'स्पन्दशास्त्र' उद्भव-
स्थितिप्रलयकारिणी महामाया को शंकराचार्य की भाँति मिथ्या नहीं प्रत्युत् शिवकी आत्म-
भूता, हृदयरूपा, आत्मसाररूपा 'शैवीमुख' एवं शिव से अभिन्न उनका नित्यस्वभाव,
नित्यधर्म, एवं उनकी स्वसमवायिनी परमाशक्ति मानता है । वह नित्य है, सृष्टिरूपा है,
शिवात्मिका है, आत्मरूपा है, चैतन्यविग्रहा है और शिव उसके बिना 'शव' है क्योंकि
'शिव' के 'श' का इकार वही है और उसके बिना 'शिव' शव बन जाता है ।—इस
सिद्धान्त का प्रतिपादन भी स्पन्दशास्त्र का लक्ष्य है और वह शक्ति 'स्वरूपस्पन्द' ही है ।
५. शंकर की आत्मा एवं परमात्मा शक्तिरहित एवं निष्क्रिय है—
'निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरंजने ।।' (वि०चूड़ा०)
'निष्क्रयोऽस्म्यविकारोस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः ।। (वि०चूड़ा०)
'कर्तापि वा कारयितापि नाहं, भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम् । (वि०चू०)
'अकर्ताहमभोक्ताहमविकारोऽहमक्रियः ।' (वि०चू०)
'स्पन्दशास्त्र' का स्पन्द एवं स्पन्दवान दोनों सक्रिय हैं और स्पन्दवान की सक्रियता
इसी 'स्वरूपस्पन्द' (स्वातंत्र्यशक्ति, विमर्शशक्ति, स्पन्द) पर आधृत है क्योंकि उसके
बिना तो शिव हिल भी नहीं सकते—
१. 'शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं,
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।' (सौन्दर्यलहरी)
तथा—२. परोऽपि शक्तिरहितः शक्त्या युक्तो भवेद्यदि ।
सृष्टिस्थितिलयान् कर्तुमशक्तः शक्त एव हि ।। (वामकेश्वरमहातन्त्र)
'स्पन्दसूत्र' ('शिवसूत्रविमर्शिनी में स्पन्द का० को 'स्पन्दसूत्र' कहा गया है) शिव
को विश्वोत्तीर्ण मानते हुए भी विश्वमय एवं पञ्चकृत्यकारी मानता है—
'स्वरूपस्पन्द' नामकरण की सार्थकता—'परमेश्वरः पञ्चकृत्यमयः सततम्
अनुग्रहमय्या परारूपया शक्त्या आक्रान्तो वस्तुतोऽनुग्रहैकात्मैव, नहि शक्तिः शिवात् भेद-
मामर्शयेत् ।।' (अभिनवगुप्त) 'परात्रिंशिकाविवृति' उसकी पाँच शक्तियाँ हैं—
१. प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः । (तन्त्रसार, अ०१)
२. प्रकाशश्च अनन्योन्मुख विमर्शः अहमिति । (प्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी)
३. स्वातंत्र्यं आनन्द शक्तिः । (तं०सार)
४. तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः । (तं०सार)
५. आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः । ('आमर्शश्च ईषत्तया वेद्योन्मुखता) ।
६. सर्वकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः । (तं०सार)
'सृष्टिसंहारकर्तारं विलयस्थितिकारकम् ।
अनुग्रहकरं देवं प्रणतार्तिविनाशनम् ।। (स्वच्छन्दतन्त्र । पटल १)