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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 111

१० स्पन्दकारिका
'शंकर' शब्द = श्रेयकर्ता का द्योतक है। 'प्रलयोदयौ' = विनाश प्रादुर्भाव के
द्योतक हैं। 'उन्मेषनिमेष'—शक्ति के प्रसार एवं प्रलय के द्योतक हैं। 'चक्र' = समूह।
'प्रभव' = कारण के द्योतक हैं।
शक्तिचक्रात्मकस्वैश्वर्यभूत जगत् का प्रभव 'इदम्' का प्रत्यायक होते हुए भी
'अहं' से पृथक् नहीं है।
वृत्तिकार भट्टकल्लट ने 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य उत्पत्तिहेतुत्वम्'
व्याख्या की है।
'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर। वही 'आत्मा' है—अर्थात् यही
उसका स्वभाव है। 'शक्तिचक्रात्मन ऐश्वर्यस्य'—यही इसका अर्थ है।
सर्वात्मवाद—
शंकर = आत्मा ॥ 'शंकर शब्देन इह प्रतिपादितः। स च आत्मैव नान्यः ॥
वृत्तिकार भी कहते हैं—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' ॥ 'स्वस्य' = आत्मा
के। 'स्व' = आत्मीय भाव। 'भाव' = स्वरूप, स्वस्वभाव ॥
सारांश—१. इच्छासृष्टिवाद २. इच्छाप्रलयवाद ३. नानात्व में एकत्व—
रामकण्ठ कहते हैं—
(क) 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति।
(ख) 'लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव माया वशात् तु नानात्वेन
अवभासते ॥'
(ग) 'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र प्रकरणे विस्तार्यते।'
आचार्य रामकण्ठ कहते हैं कि 'स्पन्दकारिका' के चारों निष्यन्द इसी प्रथम श्लोक
के स्पन्दसिद्धान्त में आसूत्रित हैं। सारांश यह कि—(क) परमात्मा माया के कारण
(स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण) वेद्य देहादिक से अव्यतिरिक्त प्रतिभासमान
आत्मा का व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है।
इस ग्रन्थ की सिद्धान्तता—(ख) इसके अनन्तर, वेदक के द्वारा ही वेद्य का
अस्तित्व होने का भान होने से वेदक एवं वेद्य में एवं उन दोनों का शक्ति से
अव्यतिरिक्तत्व सिद्ध होता है।—ये दो अर्थ हैं जिनका चारों निष्यन्दों में प्रतिपादन किया
गया है। यही इसका सिद्धान्त (सिद्ध का अन्त = सिद्ध की निष्ठा, निश्चय) है। इसकी
यह भी सिद्धान्तता संभव है कि—१. 'ज्ञान' २. 'क्रिया' ३. 'योग' एवं ४. 'चर्या'
रूप चतुष्टयपूर्ण यह स्पन्दविज्ञान ही साफल्य-प्रापक है। 'शंकरं स्तुमः' का प्रयोग इस
ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति को उद्देश्य में रखकर भी किया गया है।
'शंकरं स्तुमः' में 'शंकर' शब्द का अर्थ—
(क) उपायलक्षण—श्रेयस्कर स्पन्दशास्त्र।
(ख) उपेयलक्षण—आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञा।
'शम्' (शंकर = शम्कारक) का अर्थ है। शंकर = परमेश्वर, श्रेयकर्ता ईश्वर ॥