स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः ९
क्यों कही गई ? वस्तुतः इसके द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को द्योतित किया गया
है। जो समस्त अनन्तरूपात्मक जगत् को 'अहं' के रूप में एकात्मक एवं अहमात्मक
मानता है वह ईश्वर अपने एकात्मक नित्य स्वभाव एवं स्वरूपपरामर्श से अव्यभिचरित
रहता हुआ भी 'निरवधि-विजृंभमाण विचित्रावभास खचित त्रैलोक्यालेख्य' को 'इदम्' के
रूप में उल्लिखित करके भी परमार्थतः अपने परामृश्यमान एकात्मक स्वस्वरूप से
यत्किंचित् भी भिन्न नहीं हो पाता। कहा भी गया है—
'लिखते जगतत्रितयचित्रमद्भुतं,
प्रतिमा परिस्फुरितशंसि ते नमः ।
सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका,
रचितावभास शतशोभि शंभवे ॥
परमेश्वरता जयत्यपूर्वा,
तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या ।
अपरापि तथैव ते ययेदं,
जगदाभाति यथा तथा न भाति ॥'१
सुप्रबुद्ध महात्माओं ने इस प्रकार के शांकर ऐश्वर्य को अनुग्रह स्वीकार किया है।
चित् एवं अचित् के रूप में जो जगत् को द्विविध स्वीकार किया गया है, वह मात्र
मायावश है किन्तु वे परमेश्वर की स्वरूपशक्ति से अभिन्न हैं।
जडचेतन अभेदवाद—
'शंकरस्य पारमैश्वर्ये या इमाः परमाद्भुतमायाशक्तिवशात् चिदचिद्भेदेन द्विविधा
अपि अपर्यन्ताभावव्यक्तयः सा परमेश्वरस्य स्वरूपात् अभिन्ना शक्तिरेकैव तात्त्विकी ॥'२
शक्तिशक्तिमान में अभेदात्मकता—'शक्तीनां चक्रं' कहकर परमात्मा की अनेक
शक्तियों की बात नहीं कही गई है क्योंकि परमात्मा की मुख्य शक्ति—'स्वातन्त्र्यशक्ति'
तो एक ही है। 'इदम्' रूप में परामर्शभेद होने के कारण ही एक ही शक्ति नाना-
नामरूपात्मक रूप में अवभासित होकर 'शक्तीनां चक्रम्' कहकर बहुत्व रूप में व्यपदिष्ट
हुई है किन्तु परमार्थतः शक्ति केवल एक है। शक्ति एवं शक्तिमान में अभिन्नता दिखाने
हेतु ही 'शक्ति' शब्द का पृथक् प्रयोग किया गया है। यह ईश्वर का 'विभव' (ऐश्वर्य) है।
वस्तुतः दोनों एवं विश्व (नानात्मक भेद) एकात्मक हैं—दो पदार्थ हैं फिर भी एक हैं—
शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते ।
शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥३
'शक्तिचक्रविभवप्रभवं' में 'प्रभव' उत्पत्तिकारण का सूचक है इसके 'स्वशक्ति-
भूतविभव का प्रभव' सूचित करता है कि सारे वैभव कहीं अन्यत्र (परमात्मा से भिन्न)
से नहीं आए और न तो वे स्वरूपव्यतिरिक्त ही हैं। 'यस्य' शब्द शंकर के जगतकारणत्व
का प्रतिपादक है।
१-३. स्पन्दकारिकाविवृति ।