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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व ४१
समय सुखदुःखादि की उपाधियों के नीचे दबी रहती है तो उसको चेतन और स्वतन्त्र नहीं
कहा जा सकता। दूसरी ओर सुखदुःखादि अवस्थाओं को, उसके प्रतिद्वन्द्वी के रूप में, एक
अलग सत्तावान् पदार्थ मानना पड़ेगा परन्तु ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि सुखदुःखादि स्वयं
जड़ और अनेक होने के कारण शाश्वत सत्तावान् पदार्थ नहीं माने जा सकते हैं। कुमारिल
जैसे प्रख्यातनामा मीमांसक आत्मा को स्वतन्त्ररूप में चैतन्य न मान कर चैतन्य-विशिष्ट मानते
हैं। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह हो सकता है कि आत्मा में चैतन्य और कहीं से आया है।
कहाँ से आया है यह स्पष्ट नहीं है। कहीं से भी आया हो, परन्तु उसको स्वतन्त्र न रख कर,
आत्मा की विशेषता बनाना और आत्मा को उसका विशेष्य बनाना निष्प्राण कामिनी
के गले में कंचन का हार डालने के समान है। यह कहना कि 'गुण, गुणी के बिना ठहर
नहीं सकता है' न्यायसंगत नहीं है। ऐसी अवस्था में भी आत्मा की स्वतन्त्रता और एकता
संशय में पड़ जाती है। साथ ही यह नियम केवल संसारभूमिका पर ही चलता है क्योंकि
विश्वात्मा वही बन सकता है जो गुणों को सत्ता प्रदान करने पर भी स्वयं गुणातीत हो।
फलतः इन लोगों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद भी कुछ संतोषजनक नहीं है।
३. चार्वाकों के देहात्मवाद का पर्यालोचन—¹चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा प्राचीन भारत
के सारे बौद्ध, जैन और ब्राह्मण मतावलम्बियों को समानरूप से कभी भी मान्य नहीं रही है।
कम से कम आज भी, जबकि विश्व के कोने कोने में भौतिकवाद अपनी चरमसीमा पर पहुँच
चुका है, चार्वाकीय विचारधारा भारतीय वसुन्धरा पर पनप नहीं सकती है। यहाँ के
जनमानस की गहराइयों में शैव और वेदान्त जैसे दर्शनों के अध्यात्मवाद ने शताब्दियों से
इतनी मजबूत जड़ पकड़ ली है कि कोई या किसी प्रकार की भी भौतिकता-मूलक विचारधारा
उसको सरलता से हिला नहीं सकती। चार्वाकों की ज्ञानमीमांसा स्पष्टरूप में देहात्मवाद,
प्रत्यक्षवाद और आधिभौतिक सुखवाद पर आधारित है। इसमें धर्म, आचार और ईश्वर के
लिए कोई स्थान नहीं है। भारत का, दिनभर कड़कती धूप में काम करने वाला खेतीहर या
सड़क पर पत्थर तोड़ने वाला मजदूर, दिन भर खून-पसीना एक करके सायंकाल को मंदिर में
जाकर, जब तक भोलेनाथ या गिरधर की आरती न उतारे, तब तक उसको चैन कहाँ ? भले
ही उसका उदर आधा खाली ही रहे परन्तु ज़ोर ज़ोर से घड़ियाल बजाने में उसको अपूर्व
आनन्द और संतोष प्राप्त होता है। यह बात उसके रक्त में मिली हुई है; आखिर इससे
उसको अलग कैसे, किया जा सकता है ?
चार्वाकों का देहात्मवाद तो खैर, शरीर की नश्वरता प्रत्यक्षरूप में देखने से ही संशय
में पड़ जाता है परन्तु केवल प्रत्यक्षवाद को स्वीकार करना भी तर्क के अनुकूल नहीं है।
आखिर संसार के व्यवहार कभी कभी अनुमान या आप्तवाक्य पर भी चलते हुए दिखाई देते
हैं। अतः इन दो प्रमाणों को किसी के कहने मात्र से ही झुठलाया नहीं जा सकता। इसके
साथ ही इन लोगों ने भौतिकसुखवाद के अन्तर्गत जिस प्रकार के आचार-विचार की रूपरेखा
प्रस्तुत कर रखी है वह तो आदर्शवादी भारतीय मस्तिष्क को कभी मान्य नहीं होगी।
१. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ७१-८७.