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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

Page 52 of 190

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४२ स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
फलतः निष्कर्ष यही निकलता है कि अध्यात्मवाद की पृष्ठभूमि पर चार्वाकों के
देहात्मवाद का आलोचन करना सरासर अन्याय है क्योंकि जब ये लोग शरीर के अतिरिक्त
अन्य किसी आत्मा नामक सत्ता के सद्भाव को नहीं स्वीकारते हैं तो उन पर यह सिद्धान्त
थोपा भी कैसे जा सकता है ? ॥४॥
[स्पन्दशक्ति का पारमार्थिक अस्तित्व]
अब सूत्रकार अगले सूत्र में स्पन्दात्मक शाक्तभूमिका का स्वरूप-वर्णन करने के साथ
साथ, उसकी परमार्थ-सत्ता को सिद्ध कर रहे हैं :-
न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यो ग्राहको न च ।
न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥ ५ ॥
तस्य चायं स्वभावो यत् सुख-दुःख-ग्राह्यग्राहक-मूढतादिभावैरस्पृष्टः। स एव च
परमार्थतोऽस्ति नित्यत्वात् । सुखादयः पुनः संकल्पोत्थाः क्षणभङ्गुरा आत्मस्वरूप-
बाह्याः शब्दादिविषयतुल्याः। न च, सुखादिस्वरूपो यदा नासौ तदा पाषाणप्रख्य
एव ॥ ५ ॥
अनुवाद
सूत्र—जिसमें दुःख, सुख की अवस्थायें नहीं हैं, जिसको ग्राह्यता¹ या ग्राहकता² छू भी
नहीं लेती हैं और, जो मूढभाव³ से सर्वथा रहित है वही तत्त्व परमार्थसत्⁴ है ॥५॥
वृत्ति—उस स्पन्द-तत्त्व का यह स्वभाव है कि उसको सुख, दुःख, ग्राह्यता, ग्राहकता,
और मूढता इत्यादि भाव कभी भी स्पर्श नहीं करते हैं। वही तत्त्व परमार्थ-सत् है क्योंकि
वह नित्य है। सुख इत्यादि केवल मानसिक संकल्पों की ही उपज हैं, क्षणमात्र में नष्ट होने
वाले हैं और आत्मा के वास्तविक रूप से बाह्य हैं। अतः वे भी शब्द इत्यादि ज्ञेय-विषयों के
ही तुल्य-कक्ष हैं। इस सम्बन्ध में यह सोचना भी व्यर्थ है कि यदि उस तत्त्व को सुख
इत्यादि की अनुभूति नहीं तो वह पत्थर के समान (जड़) है ॥५॥
विवरण
शाश्वत-स्पन्दमयी संवित्-भट्टारिका बहिर्मुखीन विश्वरूप में प्रसृत होने की उन्मुखता
में स्वयं बहिर्मुख होकर सबसे पहले सूक्ष्म प्राणभूमिका या सामान्य-प्राणना की भूमिका पर
अवतीर्ण होकर, त्रिगुणात्मक अन्तःकरणों का रूप धारण कर लेती है। इन त्रिगुणात्मक
अन्तःकरणों का रूप ही सुख, दुःख और मोह होता है। अतः सुखिता, दुःखिता और मूढता
१. शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध के रूप में बहिरङ्ग प्रमेयता ।
२. पुर्यष्टक में नियन्त्रित जीव का मित प्रमातृ-भाव ।
३. किसी भी वेद्य पदार्थ को ज्ञान का विषय बनाने के सामर्थ्य का अभाव; अचेतनता की
जैसी अवस्था ।
४. शाश्वत रूप में और सदा एक रूप में वर्तमान सत्ता ।

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