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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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.४० स्पन्दकारिका
हैं। फलतः उनके द्वारा स्वीकारे गये भिन्नकालीन एवं भिन्नाकार ज्ञान अनेकाकार होने के
कारण वेद्य ही बन सकते हैं वेदक नहीं। अनेकाकारता ही वेद्यता होती है। वेद्यता में अर्थ-
प्रकाशित का स्वभाव नहीं हो सकता। अतः अर्थप्रकाशित के अभाव में ये ज्ञानक्षण स्वतः जड़
ही हैं। ये कदापि प्रकाशमान नहीं माने जा सकते।
इसके साथ ही बौद्ध लोगों का विचार है कि संसार के सारे आदान-प्रदान दूसरे
सविकल्प ज्ञानक्षणों से चलते हैं और पहला निर्विकल्प ज्ञानक्षण इनका आधार होता है।
वास्तव में बात ऐसी है कि ज्ञान का प्रथम क्षण अनुभवकाल और दूसरा क्षण स्मृतिकाल होता
है। संसार के सारे व्यवहार प्राथमिक अनुभव पर नहीं अपितु उसकी स्मृति पर आधारित
होते हैं क्योंकि संसार में एक ही पदार्थ को सैकड़ों बार देखने पर हर देखने को पहला
अनुभव नहीं कहा जा सकता। स्मृतिकाल में विषय ठीक उसी रूप में प्रकाशित होते हैं जिस
रूप में अनुभवकाल में उनका अनुभव हुआ होता है। विचारणीय यह है कि जब अनुभवक्षण
में स्मृति नहीं है और स्मृतिक्षण में अनुभव नष्ट हुआ होता है तो ऐसी परिस्थिति में
स्मृतिक्षण में घट, पट आदि पदार्थों का अनुभवकालीन रूप किस प्रकार प्रकाशित हो
सकता है ? विषयों के, ठीक वैसे ही रूप में प्रकाशित न होने की दशा में उनकी स्मृति
कैसी और परिमाणतः संसार के व्यवहारों का चलना भी कैसा ?
अब यदि बौद्धों के संस्कारसिद्धान्त को माना जाय कि अनुभव के संस्कारों से स्मृति-
क्षण में ठीक अनुभवकाल के ही आकार-प्रकार वाले विषयों का प्रकाशन हो जाता है
तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि संस्कार का स्वभाव पहली जैसी स्थिति की
स्थापना करना होता है। अनुभवकाल के संस्कार स्मृतिकाल में भी बिल्कुल अनुभवकाल
के समान रूपवाले ज्ञानों को जन्म देंगे। अनुभवकाल में विषय का अनुभव निर्विकल्प रूप में
होता है। अतः स्मृतिकाल में भी ज्ञानों का रूप निर्विकल्प ही होगा। अर्थात् स्मृति का
विषय बने हुए ग्राह्यपदार्थों में किसी प्रकार की नामरूपादि की कल्पना सम्भव नहीं होगी।
ऐसी दशा में स्मृति के द्वारा भी संसार के आदान-प्रदान कैसे सम्भव होंगे ?
इन बाधाओं को दृष्टि में रखकर शैव दार्शनिक इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि
वास्तव में इन दोनों ही ज्ञानक्षणों के बीच में इनसे इतर चेतन और स्वयंप्रकाशमान सत्ता
अनुस्यूत है जिसमें सारे अनुभव, स्मृतियां, आकार और प्रकार बीज में वृक्ष के समान अवस्थित
हैं। वह चेतनसत्ता स्वप्रकाश होने के कारण अपने आन्तरिक अनुसन्धान के द्वारा अनुभव
और स्मृति को एकाकार बनाकर और निर्विकल्प को नामरूपादि की कल्पना के द्वारा सवि-
कल्प का रूप देकर, संसार के व्यवहारों को चलाती है।
२. मीमांसकवाद का पर्यालोचन—१सुखदुःखादिविशिष्ट 'मैं' प्रतीति को ही आत्मा
का नाम देते हुए ये लोग वास्तव में बुद्धितत्त्व पर ही अवस्थित हैं क्योंकि सुख, दुःख और
मोह अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं। इस विषय में यह विचारणीय है कि यदि आत्मसत्ता प्रति-
१. अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिस्तिरस्कृत आत्मा—इति मन्वाना मीमांसका अपि
बुद्धावेव निविष्टाः। (प्र० हृ०, सूत्र ८)