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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३९
इतना कहने से इनके मत का निष्कर्ष यही निकलता है कि सुखिता दुःखिता इत्यादि
अनुभूतियों का और 'मैं' इस प्रतीति का सीधा सम्बन्ध शरीर के साथ है। अतः शरीर से
इतर आत्मा या किसी चेतन सत्ता की विद्यमानता स्वीकार नहीं की जा सकती है।
इन तीनों वादियों का मुखमुद्रण करने के लिए ग्रन्थकर्ता ने इस सूत्र के एक ही
प्रहार से इनके सभी तर्कों को धराशायी कर दिया है। ग्रन्थकार के विचारानुसार 'मैं सुखी
हूँ' इत्यादि परामर्शों में, एक ही आधारभूत सत्ता के दो रूपों की स्फुरणा अन्तर्निहित है।
सुखिता दुःखिता अथवा मूढता इत्यादि अवस्था-विशेषों से सर्वस्वतन्त्र संवित् के उस रूप का
आभास मिलता है जहाँ वह संसार की क्रीडा करने के लिए स्वेच्छा से ग्राह्यभूमिका पर अव-
तीर्ण होकर स्वयं सारे प्रमेय पदार्थों का रूप धारण कर लेती है। 'अहम्' शब्द से उस रूप
की ओर संकेत है जहाँ वह संसारी ग्राहक-भूमिका पर अवतीर्ण होकर स्वेच्छा से अपने आप
को, पांच तन्मात्रा, मनस्, बुद्धि और अहंकार के पुर्यष्टक में फंसे हुए संसारी प्रमाता
(जीवात्मा) का रूप धारण कर लेती है। 'अन्यत्र' शब्द से वह विश्वोत्तीर्ण एवं अनुत्तर रूप
अभिप्रेत है जहाँ वह प्रमातृभाव पर अवस्थित होकर इन सुखिता दुःखिता इत्यादि अवस्थाओं
के द्वन्द्वों से विहीन पूर्ण आनन्दघनता में विलीन रहती है। फलतः संवित्-भट्टारिका ही वह
धागा है जिसमें सारी प्रमेयता माला के दानों की तरह पिरोई हुई है। यही वह अन्तिम सोपान
है जहाँ पहुँच कर सारी अवस्थाओं की कल्पनायें विश्रान्त और समरस हो जाती हैं। अब
रहा प्रश्न यह कि संवित्-भट्टारिका शाक्त-प्रसर के अवसर पर किस प्रकार स्वयं ही संसारी
ग्राहक-भूमिका अथवा ग्राह्यभूमिका पर अवतीर्ण होती है? इस प्रक्रिया का यावत्-शक्य
पर्यालोचन आगे सूत्र ६ और १६ में किया जायेगा। यहाँ पर इतना ध्यान में रखना पर्याप्त
है कि शरीर, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य इत्यादि सारे जड़ एवं अजड़ पदार्थों की नानारूपता में
एक ही आधारभूत एवं जीवनदायिनी स्पन्दशक्ति, अनुस्यूत रहती है और उसकी पर-
मार्थसत्ता को किसी भी प्रकार से नकारा नहीं जा सकता।
ग्रन्थकार के आशय को भली भांति स्पष्ट करने के लिए अब उपर्युक्त आशय की
पृष्ठभूमि पर पूर्वोक्त मतवादों का थोड़ा सा परीक्षण करना युक्तियुक्त होगा-
१. बौद्धवाद का पर्यालोचन-बौद्धों ने जिन भिन्नकालीन ज्ञानों की प्रकाशमानता
स्वीकार की है वे तो त्रिगुणात्मक प्रकृति की विकारभूत¹ बुद्धि पर ही पर्यवसित होते हैं।
इस विषय में यह बात विचारणीय है, कि क्या ज्ञान के भिन्नकालीन खण्ड हो सकते हैं और क्या
ज्ञान स्वयं जड़ है या चेतन ? यदि ज्ञान भिन्नकालीन और भिन्न आकार वाले मान लिए
जाएं तो उनसे कोई अखण्ड प्रतीति कैसे सम्भव हो सकती है? साथ ही यदि ज्ञान जड़ है तो
जड़ होने के कारण वह किसी प्रकार की प्रतीति को कैसे प्रकाशित कर सकता है? यदि ज्ञान
चेतन है तो बौद्धों को जड़ से इतर कोई चेतन सत्ता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। वे ज्ञान को
स्वप्रकाश मानते हैं। प्रकाशमानता अर्थात् विषय को प्रकाशित करने के साथ साथ अपने को
भी प्रकाशित करना केवल चेतन-सत्ता का ही स्वभाव हो सकता है। परन्तु बौद्ध लोग स्वयं
ही द्रष्टा या उपलब्धा के रूप में किसी एक ही चेतन-सत्ता को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं
१. 'ज्ञानसन्तान एव तत्त्वम्' इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः। (प्र० हृ० सूत्र ८)