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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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चक्रेश्वरता की उपलब्धि १६१
(अपनी खोई हुई) भोक्तृभाव की पदवी पर पहुँच जाता है। अन्तर शक्तिचक्र का ईश्वर (पूर्ण-
शिव) बन जाता है ॥५१॥
वृत्ति—जब स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से किसी एक में भी अवस्थित होता हुआ ही,
अपने चित्त को स्पन्दतत्त्व में लीन कर लेता है तब उस प्रत्ययोद्भव के संहार और सृष्टि को
स्वतन्त्रतापूर्वक सम्पन्न करता हुआ, (खोये हुये) भोक्तृभाव को प्राप्त कर लेता है। अनन्तर
चक्रेश्वर बन जाता है अर्थात् सारे शक्तिचक्र का अधिपति (संयोजन और वियोजन का स्वतन्त्र
कर्ता पूर्ण-शिव) बन जाता है ॥५१॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र जहाँ एक ओर इस सारे स्पन्दशास्त्र का उपसंहार-सूत्र है वहाँ दूसरी ओर
इसका संग्रह-सूत्र भी है। सूत्र के साथ साथ इस सारे स्पन्द-प्रकरण का आद्योपान्त मनन एवं
अनुसंधानात्मक पर्यालोचन करने पर भी पाठक सहज ही में निम्नलिखित निष्कर्ष पर पहुँच
सकता है।
१विश्वोत्तीर्ण और विश्वात्मक रूप में केवल एक ही सर्वस्वतन्त्र चेतनसत्ता विद्यमान है।
वह सत्ता प्रकाशरूप शिव और उसकी अभिन्न विमर्शशक्ति की समरस-अवस्था है। शक्ति ही
शिव है और शिव ही शक्ति है। अहंविमर्शमय स्पन्द ही शक्ति का स्वरूप है। यह सारा नाम-
रूपात्मक व्यक्त विश्व शिव की बहिर्मुखीन शाक्त-स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है यद्यपि
अभेद भूमिका पर पूर्णाहन्तारूप स्पन्दशक्ति एक ही है तथापि वह बहिर्मुखीन भेद भूमिका के
अवभासन करने का शाश्वत स्वभाव होने के कारण, स्वतन्त्रता से, सामान्यभूमिका से विशेष-
भूमिका पर उतर कर, अनन्त भावात्मक और भूतात्मक रूपों में स्पन्दायमान है। इसके ये
अनन्त विशेष-स्पन्द ही विश्व के अनन्त चेतन और जड़ भाव हैं। इन्हीं अनन्त शाक्त-स्पन्दों
को शास्त्रीय शब्दों में 'शक्तिचक्र' कहते हैं। शिव अपनी इच्छात्मक विमर्शना से ही प्रतिसमय
इस शक्तिचक्र के २संयोजन और वियोजन (निमेषोन्मेष) के रूप में, सारे भाववर्ग के, सृष्टि
स्थिति, संहार, पिधान एवं अनुग्रह, इन पाँच कृत्यों को युगपत् और स्वतन्त्रता से करता
रहता है। फलतः वह इस सम्पूर्ण शक्ति-चक्र का स्वतन्त्र अधिपति होने के कारण
'३चक्रेश्वर' है।
४शिव और पशु में कोई मौलिक स्वरूपगत भेद नहीं है। शिव अपनी शक्ति के द्वारा
उद्भासित पुर्यष्टक में अपने ही आप को बन्दी बनाकर पशु बना है। इस अवस्था में पड़कर वह
स्वरूप को पूर्णतया भूल जाने के कारण अविवेकी, असहाय और परवश बना है। उसको

१ ग्रन्थ के प्रारम्भिक सूत्र, विशेषकर पहला सूत्र।
२. द्रष्टव्य तन्त्रालोक नवम आह्निक और ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के ज्ञानाधिकार में आभासवाद।
३. द्रष्टव्य तंत्रलोक का चौथा आह्निक।
४. ग्रन्थ के मध्यवर्ती सूत्र, विशेषकर निम्नलिखित सूत्र—'निजाशुद्ध्यासामर्थ्यस्य', गुणादिस्पन्द-
निष्यन्दाः', 'अप्रबुद्धधियः', 'शब्दराशिसमुत्थस्य', 'सम्ग्रामेऽपि प्रवृत्तस्य'।