Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

Page 170 of 190

Read in context
Page 170

१६० स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
३. गर्मी चमक और आकार इत्यादि, तेज के रूप में 'रूप-तन्मात्र' की
अभिव्यक्ति है।
४. खून पसीना इत्यादि तरल पदार्थ, जल रूप में 'रस-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है।
५. शरीर में पाये जाने वाले विभिन्न गन्धों के अतिरिक्त कठिन हड्डियाँ; मांस के
लोथड़े इत्यादि, पृथिवी के रूप में 'गन्ध-तन्मात्र' की अभिव्यक्ति है।
अब यह बात स्पष्ट हो गई कि पाञ्चभौतिक काया भी पुर्यष्टक ही है क्योंकि इसके
आधार भी वही पाँच तन्मात्र ओर तीन अन्तःकरण हैं। हां सूक्ष्म-तन्मात्रों का स्थूल कार्यरूप
होने के कारण इसकी (काया की) स्थूल-पुर्यष्टक की संज्ञा दी गई है। इन्हीं दो प्रकार के
शरीरों को दूसरे शब्दों में क्रमशः भावात्मक और भूतात्मक शरीर कहते हैं। इनके विषय में
पहले ही उल्लेख हो चुका है।
स्थूल-पुर्यष्टक अल्पकालावस्थायी है अतः प्रत्येक मरण के समय सूक्ष्मशरीर इसको
छोड़कर दूसरे भूतशरीर को धारण कर लेता है। सूक्ष्मशरीर तब तक आत्मा का पिंड नहीं
छोड़ता है जब तक उसको स्वरूप-ज्ञान प्राप्त न हो। संक्षेप में इतना कहना पर्याप्त है कि सूक्ष्म
शरीर आठ प्रकार की शलाकाओं से निर्मित एक पिंजरा है जिसमें आत्मा नामक विहङ्गम महती
रुचि से बैठा रहता है क्योंकि स्वनिर्मित विषयोपभोग की द्राक्षा का आस्वादन, उसमें मुक्ताकाश
की स्वच्छन्दमयी भूमिका की विस्मृति उत्पन्न करा देता है। साथ ही यह शरीररूपी पिंजरा
केवल पिंजरा ही नहीं अपितु आत्मा को एक स्थूल-शरीर से दूसरे में पहुँचाने वाला वाहन
भी है।
उपर्युक्त तथ्यों की पृष्ठभूमि पर, सूत्रकार का यह कथन ठीक ही है कि वास्तव में
पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन है और यही उसको स्वरूप-लाभ होने तक शतशः दुर्गंतियों में
डाल देता है ॥४९-५०॥
[ चक्रेश्वरता की उपलब्धि ]
अब अगले सूत्र में संसृति के टंटे को सदा-सर्वदा के लिये समाप्त कर देने वाले कारण
का वर्णन किया जा रहा है :-
यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोदयौ ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥५१॥
यदा पुनस्त्वेकत्र स्थूले सूक्ष्मे वा संरूढो लीनचित्तः, तदा तस्य प्रत्ययोद्भवस्य
लयोद्भवौ ध्वंसप्रादुर्भावौ नियच्छन् कुर्वन् भोक्तृतां प्राप्नोति। ततः चक्रेश्वरो भवेत्
सर्वाधिपतिर्भवति ॥५१॥
अनुवाद
सूत्र—जब (साधक) इन से (स्थूल या सूक्ष्म पुर्यष्टकों में से) किसी एक में व्यवस्थित
होता हुआ ही चित्त को लीन करके, अन्तःबहि एकाकार स्पन्दतत्त्व की अनुभूति प्राप्त कर लेता
है तब स्वतन्त्रतापूर्वक, उसके (प्रत्ययोद्भव के), सृष्टि और संहार को सम्पन्न करता हुआ,