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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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म्लानता और उसका निवारण १३७
योगी को अपने अनुसंधान से स्वयं उसकी टोह लगानी चाहिये । वह तत्त्व दोनों चिन्ताओं के
अन्तरालवर्ती सन्धिक्षण में (सावधान योगियों को), व्यापक रूप में अनुभव में आता
रहता है ॥४१॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों का भाव समझने में कोई विशेष कठिनता नहीं आती है । केवल उन्मेष
के सम्बन्ध में निम्नलिखित बात ध्यान में रखने के योग्य है ।
सूत्र ४१ में उल्लिखित 'एक-चिन्ता-प्रसक्तस्य' शब्द की व्याख्या करने में टीकाकारों का
दृष्टिकोण भिन्न भिन्न रहा है । कई टीकाकारों के विचारानुसार इसका अर्थ यह है कि
“१जब योगी दैनिक जीवन के सारे आवश्यक कृत्यों को तिलाञ्जलि देकर और अलग-अलग
किसी एक आलम्बन विशेष को अपनी धारणा का विषय बनाकर, अनुसन्धान करते करते
मानसिक एकाग्रता की चरम सीमा पर पहुँच जाता है तब उसमें स्वयं ही चित्-चमत्कारमय
उन्मेष का उदय हो जाता है ॥”
ऐसी व्याख्या के अनुसार उन्मेष-तत्त्व की अनुभूति का पूर्ण स्वाधिकार केवल जंगल
में जाकर आसन जमाने वाले और संसार के प्रति सर्वथा निरपेक्ष व्यक्तियों के लिये ही
आरक्षित बन जाता है । ऐसी परिस्थिति में आज के भौतिकयुगीन आघातप्रतिघातों में फँसे
हुये व्यक्ति के लिये इसके प्रति कोई भी आकर्षण अवशिष्ट नहीं रहने पाता है । इस सम्बन्ध
में यह बात अतीव विचारणीय है कि शैवदर्शन कभी भी पलायनवादी वृत्ति में विश्वास नहीं
रखता है । संसार और उसके आघात-प्रतिघात दोनों के प्रति निरपेक्ष कैसे रहा जा सकता है
क्योंकि दोनों शिवत्व का ही विकास हैं, अतः सत्य हैं । सत्य को नकारा कैसे जा सकता है ?
उन्मेषतत्त्व की उपलब्धि संसार को अलग रखकर नहीं, प्रत्युत उसके कण कण में इसकी व्याप-
कता को अनुभव करने से ही हो सकती है । हाँ उसके लिये महान् साहस और तीव्र आन्तर
अनुसन्धान की आवश्यकता है ।
शायद भट्टकल्लट ने इसी विचार की पृष्ठभूमि पर उपरिनिर्दिष्ट शब्द की सीधी
व्याख्या करके यह तथ्य समझाया है कि प्रतिक्षण मन में उदित और अस्त होने वाली असंख्य
चिन्ताओं के अन्तरालवर्ती संधिक्षणों में नित्योदित उन्मेषतत्त्व की व्यापकता अनुभव में आ
सकती है । उसके लिये उत्सुक व्यक्ति को संसार छोड़कर जंगल में जाने की नहीं, अपितु
संसार का सारा कार्यकलाप करते हुये भी आन्तर विमर्श के द्वारा उस तत्त्व के साथ
नित्ययुक्त रहने की आवश्यकता है ॥४०-४१॥
यहाँ तक योगियों में अभिव्यक्त होने वाली अमित सिद्धियों का वर्णन किया गया ।
अब अगले सूत्र में अवरकोटि की अपरसिद्धियों का संकेतरूप में उल्लेख करके यह समझाया
जा रहा है कि इस प्रकार की सिद्धियाँ असावधान योगियों को क्षोभ में डालकर वास्तविक
लक्ष्य से च्युत कर देती हैं—
१. द्रष्टव्य—स्प० नि०, ३. ८ की व्याख्या ।
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal