सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextब्रह्मज्ञानकी शाब्द अपरोक्षता ] भाषानुवादसहित ४७५
त्पादयति शास्त्रीयसंस्कारसंस्कृताग्न्यधिकरणक इव होमोऽपूर्वमिति कल्प्यते । 'तरति शोकमात्मवित्' इति शास्त्रप्रामाण्याद् । अपरोक्षस्य कर्तृत्वाध्यासस्यापरोक्षाधिष्ठानज्ञानं विना निवृत्त्ययोगाद् औपनिषदे ब्रह्मणि मानान्तराप्रवृत्तेः शब्दादप्यपरोक्षज्ञानानुत्पत्तौ अनिर्मोक्षप्रसङ्गादित्याहुः ।
भावनाऽऽवृत्तिसचिवाद्धिधुरस्येव मानसात् ।
कामिन्या इव शब्दात्तामितरे सम्प्रचक्षते ॥ २२ ॥
भावनाकी आवृत्तिसे युक्त अन्तःकरणसे जैसे विधुर पुरुषको कामिनीका साक्षात्कार होता है, वैसे ही भावनाकी आवृत्तिसे युक्त शब्दसे भी ब्रह्मसाक्षात्कार होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥२२॥
शब्द अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न करता है, जैसे कि शास्त्रीय संस्कारसे संस्कृत † अग्निमें होनेवाला होम अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि 'तरति शोकमात्मवित्' यह श्रुति प्रमाण है। और अपरोक्षरूप कर्तृत्वादि अध्यासकी अधिष्ठानविषयक अपरोक्ष ज्ञानके विना × निवृत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए जिसमें अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं है, ऐसे केवल उपनिषत् प्रमाणगम्य ब्रह्मकी शब्दसे भी अपरोक्षानुभूति न मानी जाय, तो मोक्षकी ‡ अप्रसक्ति होगी ।
† अर्थात् आधान आदि संस्कारोंसे संस्कृत अग्निमें किया हुआ होम (त्यक्त द्रव्यका अग्निमें प्रक्षेप ) ही अपूर्वकी उत्पत्ति करता है, क्योंकि आधान आदि संस्कार से रहित अग्निमें किया हुआ होम अपूर्वकी उत्पत्तिमें समर्थ नहीं है, इसी प्रकार शब्द भी उक्त चित्तदर्पणानुगृहीत होकर अपरोक्षज्ञानकी उत्पत्ति करता है, यह भाव है।
× कारण कि श्रवण आदिसे उत्पन्न परोक्षज्ञानके रहते हुए भी कर्तृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति नहीं होती है, यदि परोक्षज्ञानमात्रसे अध्यासकी निवृत्ति मानी जाय, तो मनन आदिका विधान व्यर्थ होगा और अपरोक्ष दिग्भ्रम अपरोक्ष साक्षात्कारके विना निवृत्त भी नहीं होता, अतः अपरोक्षकर्मृत्वादि अध्यासकी निवृत्ति करनेके लिए अवश्य शब्दसे अपरोक्ष ज्ञान मानना चाहिए, यह भाव है ।
‡ तात्पर्य यह है कि अतीन्द्रिय मनको यदि ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति करण माना जाय, तो केवल उपनिषत्प्रमाणसे ही ब्रह्मका ज्ञान होता है, इस औपनिषदत्वश्रुतिके साथ विरोध होनेसे ब्रह्ममें किसी शब्दभिन्न प्रमाणकी प्रवृत्ति न होनेपर शब्दकी भी यदि प्रवृत्ति न मानी जाय, तो ब्रह्मसाक्षात्कारकरणके लब्ध न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कार भी नहीं होगा और सुतरां मोक्षबोधक सम्पूर्ण शास्त्रोंकी अप्रामाण्यप्रसक्ति होगी, इसलिए मोक्षबोधकशास्त्रोंके प्रामाण्यके लिए अवश्य शब्दको साक्षात्कारके प्रति करण मानना चाहिए, यह भाव है ।