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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 504 of 590

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Page 504
४७४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

शाब्दसाक्षात्कारजननेऽपि तदैकाग्र्यस्याऽपेक्षितत्वेन हेतुत्वमात्रेण तृतीयोपपत्तेः । 'मनसा ह्येष पश्यति मनसा शृणोति' इत्यादौ तथा दर्शनात् । गीताविवरणे भाष्यकारीयमनःकरणत्ववचनस्य मतान्तराभिप्रायेण प्रवृत्तेरित्याहुः ॥ ९ ॥

ननु तथाऽपि शब्दस्य परोक्षज्ञानजनकत्वस्वभावस्याऽपरोक्षज्ञानजनकत्वं न सङ्गच्छते इति चेत्,

मानान्तरस्याप्रसरात्परोक्षेण भ्रमाक्षयात् ।
सहकारिविधानाच्च शब्दादप्यपरोक्षधीः ॥ २१ ॥

ब्रह्ममें किसी अन्य प्रमाणकी प्रवृत्ति नहीं होनेसे, परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे और सहकारी (मनन आदि) का विधान होनेसे शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान हो सकता है ॥२१॥

अत्र केचित्—स्वतोऽसमर्थोऽपि शब्दः शास्त्रश्रवणमननपूर्वकप्रत्ययाभ्यासजनितसंस्कारप्रचयलब्धब्रह्मैकाग्र्यचित्तदर्पणानुगृहीतोऽपरोक्षज्ञानमु-


युक्त नहीं है, क्योंकि शब्दसाक्षात्कारके उत्पादनमें भी मनकी एकाग्रताकी अपेक्षा होनेसे केवल हेतु अर्थमें भी उक्त तृतीयाकी (मनसा) उपपत्ति हो सकती है। 'मनसा ह्येष' (यह मनसे देखता है और मनसे सुनता है) इत्यादि स्थलमें चाक्षुष आदि ज्ञानमें मनकी करणताके न होनेपर भी केवल हेतुत्वरूपसे तृतीयाकी उपलब्धि है। गीताके विवरणमें मनमें करणताका प्रतिपादक जो भाष्यकारका वचन है, उसकी किसी मतान्तरसे (वृत्तिकारके मतसे) प्रवृत्ति हुई है, खास निजी मतसे नहीं, अतः कोई अनुपपत्ति नहीं है ॥९॥

अब शङ्का होती है कि शब्दके ब्रह्मसाक्षात्कारकरणत्वपक्षमें श्रुति और भाष्यका विरोध यद्यपि नहीं है, तथापि जिस शब्दका स्वभाव परोक्षज्ञानजनकता है, उसकी अपरोक्षज्ञानजनकता कैसे सङ्गत हो सकती है ?

इस प्रश्नके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि शब्द स्वतः अपरोक्षज्ञान करनेमें समर्थ नहीं है, तथापि शास्त्रश्रवणमननपूर्वक प्रत्ययाभ्याससे उत्पन्न अनेक संस्कारोंसे प्राप्त ब्रह्मैकाग्र्यसे युक्त चित्तरूप दर्पणसे * अनुगृहीत


* जैसे चक्षु अपने आप प्रतिबिम्बका ग्रहण नहीं करता है, तथापि दर्पणके समवधानसे प्रतिबिम्बका ग्रहण करता है, वैसे ही प्रकृतमें चित्ताख्य दर्पणसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञानको पैदा करता है, यह भाव है।

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