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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 506 of 590

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Page 506
४७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ तृतीय परिच्छेद

अन्ये तु भावनाप्रचयसाहित्ये सति बहिरसमर्थस्यापि मनसो नष्ट-वनितासाक्षात्कारजनकत्वदर्शनाद् निदिध्यासनसाहित्येन शब्दस्याप्यपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तमिति दृष्टानुरोधेन समर्थयन्ते ।

विज्ञातृचिदभिन्नस्य विषयस्यापरोक्षतः ।
पारोक्ष्यासम्भवादन्ये प्राहुः शब्दापरोक्षताम् ॥ २३ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न विषयका अपरोक्षत्व होनेसे और शब्दसे परोक्षज्ञानका सम्भव न होनेसे शब्दसे ही ब्रह्मका अपरोक्ष होता है ॥२३॥

अपरे तु अपरोक्षार्थविषयत्वं ज्ञानस्याऽपरोक्षत्वं नाम, अन्यानिरुक्तेः । अर्थापरोक्षत्वं तु नापरोक्षज्ञानविषयत्वम्, येनाऽन्योन्याश्रयो भवेत् । किन्तु तत्तत्पुरुषीयचैतन्याभेदः । अन्तःकरणतद्धर्माणां साक्षिणि कल्पिततया·


* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि बाह्य पदार्थके ग्रहण करनेमें स्वतः मन असमर्थ है, तथापि भावनाधिक्यके सहकारसे वह अन्तःकरण विनष्ट वनिताके साक्षात्कारमें जैसे जनक देखा जाता है, वैसे ही निदिध्यासनके सहकारसे शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानको उत्पन्न कर सकता है ।

† अन्य लोग कहते हैं कि ज्ञानका अपरोक्षत्व अपरोक्षार्थविषयत्व है, क्योंकि उसका ( अपरोक्षत्वका ) निर्वचन अन्य प्रकारसे नहीं हो सकता है । अर्थनिष्ठ अपरोक्षत्व अपरोक्षज्ञानविषयत्वरूप नहीं है, जिससे कि अन्योन्याश्रय हो, किन्तु तत्-तत् पुरुषोंके चैतन्यके साथ अभेद है, ‡ अन्तःकरणोंके धर्मोंकी


* शास्त्रप्रमाण कदाचित् न लिया जाय और केवल युक्तिके आधारपर ही विचार किया जाय, तो भी अपरोक्षज्ञानजनकत्व घट सकता है, ऐसा इस मतसे प्रतिपादन करते हैं ।
† अब शब्दमें परोक्षज्ञानजनकत्व हैं ही नहीं, अतः नित्य अपरोक्षब्रह्मके साक्षात्कारमें वेदान्तोंकी करणता अबाधित है, इस प्रकारके मतान्तरको कहते हैं ।
‡ तात्पर्य यह है कि अन्य प्रकारकी अनुपलब्धि होनेसे अर्थका अपरोक्षत्व यदि अपरोक्ष-ज्ञानविषयत्व माना जायगा, तो अन्योऽन्याश्रय होगा, क्योंकि अर्थके अपरोक्षत्वकाज्ञान होनेपर ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होगा और ज्ञानके अपरोक्षत्वका ज्ञान होनेपर अर्थ की अपरोक्षताका ज्ञान होगा, इसलिए अपरोक्षज्ञानविषयकत्वको अर्थका अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं, किन्तु तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्नत्व ही उन उन विषयोंका तत्-तत् प्रमाताके प्रति अपरोक्षत्व है । अर्थात् तत्-तत् प्रमातृचैतन्यसे अभिन्न अर्थविषयक ज्ञान ही तत्-तत् प्रमातृचैतन्याभिन्न विषयमें अपरोक्षज्ञान है । यदि शङ्का हो कि इस प्रकारके अर्थापरोक्षत्वका अनुगम नहीं हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्वकी जातिरूपता

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