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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 49 of 590

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Page 49

[विधिविचार] भाषानुवादसहितं २१


मात्मा' इत्यादिप्रकरणपर्यालोचनया अद्वितीयात्मपरत्वात्। नहि वस्तुसत्साधनान्तरप्राप्तावेव नियमविधिरिति कुलधर्मः; येन वेदान्तश्रवण-नियमार्थवत्त्वाय नियमादृष्टजन्यस्वप्रतिबन्धककल्मषनिवृत्तिद्वारा सत्तानिश्चय-रूपब्रह्मसाक्षात्कारस्य वेदान्तश्रवणैकसाध्यत्वस्याऽभ्युपगन्तव्यत्वेन तत्र वस्तुतः साधनान्तराभावान्न नियमविधिर्युज्यत इति आशङ्क्येत; किन्तु यत्र साधनान्तरतया सम्भाव्यमानस्य पक्षे प्राप्त्या विधित्सितसाधनस्य पाक्षिक्यप्राप्तिर्निवारयितुं न शक्यते, तत्र नियमविधिः। तावतैवाऽप्राप्तांश-परिपूरणस्य तत्फलस्य सिद्धेः।


है) इस श्रुतिके प्रकरणके पर्यालोचनसे ऐसा ज्ञात होता है।

[ यहाँपर शङ्का होती है कि तण्डुलकी उत्पत्तिमें अवघातके समान नखविदलनकी वस्तुतः साधनरूपसे प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए वहाँ नियमविधि मानना उचित है, परन्तु प्रकृतस्थलमें अद्वितीय आत्माके साक्षात्कारमें भिन्नात्म-विचार वास्तविक साधन नहीं है, अतः प्रकृतमें नियमविधि उसकी व्यावृत्तिके लिए नहीं हो सकती । इसका उत्तर 'नहि' इस ग्रन्थसे देते हैं ] 'वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्ति रहते ही नियमविधि होती है' यह कोई कुलधर्म नहीं है अर्थात् जैसे कुलक्रमसे प्राप्त धर्मकी आवश्यकता है, वैसे वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्तिकी आवश्यकता नहीं है, जिससे कि वेदान्त-श्रवणके नियमकी सार्थकताके लिए यह स्वीकार किया जाय कि नियमापूर्वसे उत्पन्न जो ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रतिबन्धकीभूत पापोंका निरसन, उसके द्वारा सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्षसाक्षात्कार वेदान्तके श्रवणमात्रसे साध्य है, ऐसा मानकर ब्रह्मसाक्षात्कारमें वस्तुतः अन्य साधनका अभाव होनेसे प्रकृतमें नियम-विधि युक्त नहीं है, ऐसी आशङ्का की जाय। किन्तु जहाँपर सम्भावित अन्य-साधनकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे विधानके लिए अभीष्ट साधनकी पाक्षिक अप्राप्तिका निवारण नहीं कर सकते हैं, वहाँपर नियमविधि होती है। इसीसे अप्राप्तां-शपरिपूरणरूप नियमविधिके फलकी सिद्धि हो जाती है।


* सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति विधित्सित गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणके समान गुरुसे निरपेक्ष वेदान्तश्रवण भी कारण है, इसलिए गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणका नियम माना जायगा, परन्तु उसका कोई प्रत्यक्ष फल तो है नहीं। अतः नियमापूर्व मानना होगा। और उससे पापोंकी निवृत्ति होगी और उसके द्वारा नियमादृष्ट ब्रह्मसाक्षात्कारमें साधन होगा, इस प्रकार नियमविधिमें कल्पना करनी होगी।