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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 48 of 590

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Page 48
२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

इत्यादिश्रवणाद् भिन्नात्मज्ञानात् मुक्तिरिति भ्रमसम्भवेन मुक्तिसाधनज्ञानाय भिन्नात्मविचाररूपे शास्त्रान्तरश्रवणेऽपि पक्षे प्रवृत्तिस्स्यादित्यद्वैतात्मपर-वेदान्तश्रवणनियमविधिरयमस्तु। इहाऽऽत्मशब्दस्य 'इदं सर्वं यदय-

ईश्वरके स्वरूपको जब देखता है, तब ईश्वरकी महत्ताको प्राप्त करता है और शोक-दुःखसे निर्मुक्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुतियोंके श्रवणसे जीवसे भिन्न—आत्माके ज्ञानसे मुक्ति होती है, इस प्रकारका भ्रमात्मक ज्ञान हो सकता है। जिनमें परमात्मा जीवसे पृथक् है, ऐसा विचार किया गया है, ऐसे अन्य शास्त्रों—न्याय, सांख्य आदिमें उक्त भ्रमसे ही मुक्तिके साधनीभूत ज्ञानके लिए प्रवृत्ति होगी, इससे अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध करानेवाले वेदान्तके श्रवणमें मनुष्यकी प्रवृत्ति पक्षमें होगी, अतः उसकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह श्रवणविधि नियमविधि है। प्रकृतमें 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिमें आत्मशब्द अद्वितीय आत्मपरक है, क्योंकि 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (जो सब यह चारों तरफ देखा जाता है, वह आत्मा


भ्रान्ति हो सकती है अर्थात् विचारके विना वेदान्तोंका ठीक तात्पर्य किसमें है, यह निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए मुक्तिके साधनकी अन्वेषणा करनेवाला तथा तत्त्वज्ञानके प्रतिबन्धक तात्पर्याभ्रम और संशय आदिकी निवृत्ति करनेके लिए वेदान्तके विचारमें प्रवृत्त हुआ पुरुष जैसे उत्तरमीमांसाशास्त्रमें प्रवृत्त होता है, वैसे ही न्याय, सांख्य आदि शास्त्रोंमें भी प्रवृत्त होगा; क्योंकि उनमें भी उनके अभिप्रायानुकूल वेदान्तका विचार है। यद्यपि सांख्य आदि शास्त्रोंमें अद्वितीय आत्मतत्त्वका प्रतिपादन नहीं है, तो भी 'जीवभिन्न आत्माका ज्ञान मुक्तिका साधन है' इस प्रकार भ्रमात्मक ज्ञानसे उन शास्त्रोंमें प्रवृत्ति हो सकती है। और 'भिन्नात्मज्ञान मुक्तिका साधन है' ऐसा भ्रमात्मक ज्ञान साङ्गवेदाध्यायीको नहीं होता है, यह भी हम नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'जुष्टं यदा' इत्यादि श्रुतिमें अन्य शब्द पढ़ा गया है, इससे उसको भ्रम हो सकता है। वस्तुतः इस श्रुतिका अर्थ—समीपमात्रसे बुद्धि आदिका प्रवर्त्तक बुद्धि आदिसे वस्तुतः भिन्न [ जीव भिन्न नहीं है, क्योंकि जीव और ब्रह्मका भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे उपदेश व्यर्थ होगा ] और ऋषियोंसे सेवित ईश्वरका आत्मरूपसे जब ज्ञान करता है, तब ईश्वरके वास्तविकरूपकी प्राप्ति करता है और शोकरहित हो जाता है। अतः भ्रमसे शास्त्रान्तरके विचारमें प्रसक्त प्रवृत्तिका निराकरण करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है। परन्तु 'श्रोतव्यः' इस श्रुतिसे केवल आत्मविचार ही प्राप्त होता है, अद्वैत आत्मविचार प्राप्त नहीं होता, अतः इस श्रुतिसे भिन्नात्मविचारकी व्यावृत्ति कैसे होगी, इस शङ्काको दूर करनेके लिए 'इह' इत्यादि ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। इसमें आदिशब्दसे 'आत्मनि ज्ञाते सर्वं विदितं भवति' (आत्माके ज्ञात होनेपर सब विदित होता है) इत्यादि प्रतिज्ञावाक्य लिया जाता है। इससे यह जाना जाता है कि 'आत्मा वा अरे' इत्यादिमें 'आत्मा'से अद्वितीय आत्माका ही ग्रहण है, यह भाव है।