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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 421 of 590

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Page 421

जीवोपाधिभेद-विचार] भाषानुवादसहित ३९१


न च—

'उद्यतायुधदोर्दण्डाः पतितस्वशिरोऽक्षिभिः ।
पश्यन्तः पातयन्ति स्म कवन्धा अप्यरीनिह ॥'

इति भारत्तोक्त्या विश्लेषेऽप्यनुसन्धानमवगतमिति वाच्यम् , तत्रापि शिरःकवन्धयोरेकस्मिन् अवयविन्यवयवभावेनाऽनुप्रविष्टचरत्वात् शिरश्छेदनानन्तरं मूर्च्छामरणयोरन्यतरावश्यंभावेन दृष्टविरुद्धार्थस्य तादृशवचनस्य कैमुत्यन्यायेन योधोत्साहातिशयप्रशंसापरत्वात् । तादृशप्रभावयुक्तपुरुष-


यदि शङ्का हो कि 'उद्यतायुध०' ( जिनके भुजदण्डमें आयुध उद्यत हैं, ऐसे कबन्ध भी—[ जिन योद्धाओंके सिर छिन्न हो गए हैं, वे कबन्ध कहे जाते हैं ] गिरे हुए अपने सिरको अक्षियोंसे देखते हुए रणभूमिमें शत्रुओंके प्राण लेते हैं। ) इस महाभारतकी उक्तिसे ज्ञात होता है कि उपाधिका विश्लेष होने-पर भी † अनुसन्धान होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें भी सिर और कबन्धका एक अवयवीमें अवयवरूपसे पूर्वमें प्रवेश होनेसे मस्तक छेदनके बाद मूर्च्छा या मरण इन दोनोंमें से कोई अवश्य होता है, इस-लिए प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले उक्त वचनको कैमुतिक-न्यायसे ‡ योद्धाओंके उत्साहातिशयका प्रशंसार्थक ही मानना होगा। अथवा विशिष्ट × प्रभावसे युक्त पुरुषविशेषविषयक होनेसे उक्त वचनको यथार्थ


† जैसे चैत्र और मैत्रके शरीर विश्लिष्ट हैं, वैसे ही कबन्ध और उसका मस्तक विश्लिष्ट है, तो भी विश्लिष्ट शिरोवच्छिन्न चैतन्यसे कबन्धावच्छिन्न आत्माके योद्धापनका अनुसन्धान होता है, अतः व्यभिचार है, यह भाव है।

‡ अर्थात् जब कबन्ध भी शत्रुओंसे टक्कर लेते हैं, तब अन्य जीवित योद्धाओंके उत्साहमें क्या कहना है, यह भाव है।

× तात्पर्य यह है. कि उक्त महाभारतका वचन प्रशंसार्थक नहीं है, प्रत्युत यथार्थ है, क्योंकि योगप्रभावसे या वरदानके माहात्म्यसे मस्तक छेदनके अनन्तर भी युद्धका अनु-सन्धान हो सकता है, तो फिर विश्लिष्ट उपाधि अननुसन्धानकी प्रयोजक है, इस नियमका व्यभिचार तो स्थिर ही है, इस प्रकारकी शङ्का हो, तो इसका 'तादृक्' इत्यादि मूलसे परिहार करते हैं—अर्थात् उक्त महाभारतका वचन उन्हीं पुरुषोंको उद्देश कर कहता है, जो वीर पुरुष योगी या वरदान प्राप्त किये हुए थे, उनके मस्तकका छेदन होनेपर भी अपने गिरे हुए सिर आदिसे अनुसन्धान करके वे अपने शत्रुओंसे लड़ते थे, इसलिए योगादिप्रभावविधुर पुरुषोंके अननुसन्धानमें विश्लिष्ट उपाधि प्रयोजक है, योगादिप्रभावयुक्त पुरुषोंके प्रति वह प्रयोजक नहीं है।

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