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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 422 of 590

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Page 422
३९२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

विशेषविषयत्वेन भूतार्थवादत्वेऽपि निरुक्तस्योत्सर्गतोऽननुसन्धानतन्त्रत्वा-
विघाताच्च । अत एवोक्तवक्ष्यमाणपक्षेषु योगिनां जातिस्मराणां च
शरीरान्तरवृत्तान्तानुसन्धाने न दोषप्रसक्तिः ।

देहभेदं परे प्राहुर्बाल्यादिषु न तद्भिदा ।
माययाऽपचयौ देहो दीपवन्नैव चाणुभिः ॥ ६५ ॥

अन्य लोग कहते हैं कि 'शरीरका भेद भोगके असाङ्कर्यका प्रयोजक है' बाल्या-
वस्था आदिका शरीर भिन्न नहीं है दीपकके समान मायासे छोटा और बड़ा शरीर होता
है, अणुओंसे नहीं होता है ॥ ६५ ॥

अपरे तु शरीरैक्यभेदावनुसन्धानतदभावप्रयोजकोपाधी, बाल्यभवा-
न्तरानुभूतयोरनुसन्धानतदभावदृष्टेः । न च बाल्ययौवनयोरपि शरीरभेदः
शङ्कनीयः, प्रत्यभिज्ञानात् । न च परिमाणभेदेन तद्भेदावगमः,

मान लिया जाय, तो भी उक्त विशिष्टोपाधिभेदके स्वाभाविक अननुसन्धानके
प्रयोजकत्वका व्याघात नहीं हो सकता है । उक्त प्रयोजकके औत्सर्गिक होनेसे
कहे हुए और कहे जानेवाले पक्षमें योगी और पूर्वकी जातिस्मरण करनेवालोंके
अन्य शरीरके वृत्तान्तके अनुसन्धानमें कोई दोष नहीं है ।

कुछ लोग तो कहते हैं कि शरीरका ऐक्य और शरीरका भेद ही अनु-
सन्धान और अननुसन्धानमें क्रमशः प्रयोजक उपाधि हैं, क्योंकि बाल्यावस्थामें
और जन्मान्तरमें अनुभूत पदार्थोंका वृद्धावस्थामें अनुसन्धान और इस जन्ममें
अननुसन्धान देखा* जाता है । यदि शङ्का हो कि बाल्यावस्था और युवास्थाके
शरीरोंका भेद है ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'वही यह शरीर है'
इस प्रकार उनकी ऐक्यावगाहिनी प्रत्यभिज्ञा होती है । यदि शङ्का हो कि बाल्य
और युवावस्थाके शरीरोंका परिमाणके भेदसे भेद है, तो यह भी युक्त नहीं


* अर्थात् बाल्यावस्थामें जिस किसी पदार्थविशेषका अनुभव किया गया है, उसका
युवावस्थामें स्मरण होता है, उसका कारण यही है, कि बाल्य और यौवन अवस्थाका शरीर एक
है, और जन्मान्तरमें अनुभूत पदार्थका जो स्मरण नहीं होता है, उसमें कारण यही है कि
जन्मान्तरका शरीर और इस जन्मका शरीर परस्पर भिन्न है, अतः इस अनुभवसे अनुसन्धान
और अननुसन्धानमें शरीरैक्य और शरीरभेदको क्रमशः प्रयोजक माननेमें कोई हानि नहीं
है, यह भाव है।

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