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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 420 of 590

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Page 420

३९० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


वच्छिन्नेनाऽनुसन्धीयते । नाप्युभयशरीरानुस्यूतावयव्यन्तरावच्छिन्नेनाऽनुसन्धीयते । उभयानुस्यूतस्याऽवयविनो भोगायतनस्यैवाऽभावादिति न चैत्रशरीरलग्नकण्टकोद्धाराय मैत्रशरीरव्यापारप्रसङ्ग इति ।

अन्ये विश्लिष्टतद्भेदं भोगासाङ्कर्यकारणम् ॥ ६४ ॥

अन्य लोग विश्लिष्ट उपाधिका भेद भोगके असाङ्कर्यका प्रयोजक है, ऐसा कहते हैं ॥ ६४ ॥

अन्ये तु विश्लिष्टोपाधिभेदोऽननुसन्धानप्रयोजकः । तथा च हस्ता-वच्छिन्नस्य चरणावच्छिन्नवेदनानुसन्धानाभ्युपगमेऽपि न दोषः । न चैवं सति गर्भस्थस्य मातृसुखानुसन्धानप्रसङ्गः । एकस्मिन्नवयविन्य-वयवभावेनाऽननुप्रविष्टयोर्विश्लिष्टशब्देन विवक्षितत्वाद् मातृगर्भशरीरयोस्तथात्वादित्याहुः ।


रूपसे अनुवर्तमान किसी अन्य अवयवीसे अवच्छिन्न आत्मासे भी अनुसन्धान नहीं हो सकता है, क्योंकि उभय अर्थात् चैत्र और मैत्र दोनोंके शरीरमें अनुवर्तमान सुखदुःखका आश्रयीभूत कोई अवयवी ही नहीं है, इसलिए चैत्रके शरीरमें लगे हुए कण्टकके निकालनेके लिए मैत्रके शरीरका व्यापार प्रसक्त नहीं होता है ।

कुछ लोग कहते हैं कि विश्लिष्ट (विश्लेष—विभाग—को प्राप्त हुई) भोगायतनरूप उपाधिका भेद अननुसन्धानका प्रयोजक है । इसलिए हस्ता-वच्छिन्न आत्माको चरणावच्छिन्न आत्मामें रहनेवाले दुःखादिका अनुभव होगा, तो भी कोई हानि नहीं है * । यदि शङ्का हो कि उक्त विश्लिष्ट उपाधिको ही अननुसन्धानका प्रयोजक माना जाय, तो गर्भस्थ जीवको माताके सुखका अनुसन्धान प्रसक्त होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जिनका एक अवयवीमें अवयवभावसे प्रवेश नहीं है, उन्हींको विश्लिष्टशब्दसे कहा जाता है, अतः माताके और गर्भके शरीरका एक अवयवीमें अवयवरूपसे प्रवेश न होनेसे उक्त दोष नहीं है ।


* भोगायतनभूत हस्त और चरणका परस्पर भेद होनेपर भी वे विश्लिष्ट नहीं है, अतः विश्लिष्ट भोगायतनभेदरूप अननुसन्धानके प्रयोजक नहीं होनेसे चरणावच्छिन्न आत्माके दुःख आदिका हस्तावच्छिन्नसे यदि अनुभव हो, तो भी दोष नहीं है, यह भाव है ।