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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 412 of 590

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Page 412
३८२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

संसारी न स्यादिति वाच्यम्, कर्तृत्वादिबन्धाश्रयाहङ्कारग्रन्थिातादात्म्याध्यासाधिष्ठानभाव एव तस्य संसारः' इत्युपगमात् । तावतैव भीषणत्वाश्रयसर्पतादात्म्याध्यासाधिष्ठाने रज्ज्वादौ 'अयं भीषणः' इत्यभिमानवद् आत्मनोऽनर्थाश्रयत्वाभिमानोपपत्तेः । एतदभिप्रायेणैव 'ध्यायतीव लेलायतीव' 'अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते' इत्यादि-श्रुतिस्मृतिदर्शनाच्च ।

न चैकस्मिन्नेवाऽऽत्मनि विचित्रसुखदुःखाश्रयतत्तदन्तःकरणानामध्या-

तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चके आश्रयीभूत * अहङ्कार (अन्तःकरण) के साथ ग्रन्थिरूप तादात्म्यके अध्यासका जब आत्मा अधिष्ठान भाव है, तभी वही आत्माका संसार है, ऐसा स्वीकार किया गया है। उपाधि ही संसारकी आश्रय है, इसीसे † जैसे भयकारणत्वके आश्रयीभूत सर्पके तादात्म्याध्यासके अधिष्ठानभूत रस्सीमें 'यही भय हेतु है' इस प्रकार अभिमान होता है, वैसे ही आत्मा (अन्तःकरणतादात्म्याध्यासाधिष्ठान होनेसे) अनर्थका आश्रय है, यह अभिमानमात्र (भ्रान्तिमात्र) है। बुद्धिका ही संसार आत्मामें आरोपित है, इसी भावसे—'ध्यायतीव०' (बुद्धिके ध्यान करनेसे मानो आत्मा ध्यान करता है, बुद्धिके चलनेपर आत्मा मानो चलता है, ऐसा प्रतीत होता है) 'अहङ्कार०' (कर्तृत्वाश्रय अहङ्कारके साथ तादात्म्यापन्न होनेसे ही आत्मा अपनेको कर्ता मानता है) इस प्रकारकी श्रुति-स्मृतियाँ देखी जाती हैं।

यदि ‡ शङ्का हो कि बुद्धिके धर्मोंकी व्यवस्था होनेपर भी विचित्र सुख, दुःखके आश्रयीभूत तत्-तत् अन्तःकरणोंका एक ही आत्मामें अध्यास होनेसे


* चेतन स्वतः संसारका आश्रय नहीं है, तथापि बुद्धिमें रहनेवाले संसारका, (जो कि साक्षीसे अनुभूत है,) उसमें आरोप हो सकता है, इसलिए आरोपित संसाराश्रयत्व आत्मामें है, यह भाव है।

† तावतैव—केवल उपाधिके संसाराश्रयत्व होनेसे प्रकृतमें यदि शङ्का हो कि अन्यनिष्ठ संसारका आत्मामें आरोप यदि माना जाय, तो अन्यथाख्याति प्रसक्त होगी ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अनुभूयमान आरोपस्थलमें आरोप और अधिष्ठानके अनिर्वचनीय संसर्गकी उत्पत्ति मानी जाती है, अन्यथाख्यातिवादमें उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जाती है, यह वैषम्य है।

‡ बुद्धि स्वतः संसारकी आश्रय है और आत्मामें संसारकी केवल भ्रान्ति है, इस व्यवस्थाको