सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextजीवोपाधिभेद-विचार] भाषानुवादसहितं ३८१
वस्था । ‘कामस्संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिरधृतिर्हीर्धीर्भीरित्ये-
तत्सर्वं मंन एव’ ‘विज्ञानं यज्ञं तनुते’ इत्यादिश्रुतिभिस्तस्यैव निखिला-
नर्थाश्रयत्वप्रतिपादनात् । ‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ ‘असङ्गो नहि सज्जते’
इत्यादिश्रुतिभिः चेतनस्य सर्वात्मनौदासीन्यप्रतिपादनाच्च ।
न चैवं सति कर्तृत्वादिबन्धस्य चैतन्यसामानाधिकरण्यानुभवविरोधः ।
अन्तःकरणस्य चेतनतादात्म्येनाध्यस्ततया तद्धर्माणां चैतन्यसामानाधि-
करणाऽनुभवोपपत्तेः । न चाऽन्तःकरणस्य कर्तृत्वादिबन्धाश्रयत्वे चेतनः
भेदसे सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था सिद्ध ही है, क्योंकि ‘कामस्संकल्पो०’ (इच्छा, संकल्प, संशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय ये सब अन्तःकरणके परिणाम होनेसे मन ही हैं) ‘विज्ञानं यज्ञं तनुते’ (अन्तःकरण शास्त्रीय कर्म करता है) इत्यादि श्रुतियाँ उसी अन्तःकरणका सम्पूर्ण अनर्थोंके आश्रयरूपसे प्रतिपादन करती हैं। और ‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (सर्वदा चैतन्यात्मा ब्रह्म असङ्ग—किसी धर्म विशेषका आश्रय नहीं है) ‘असङ्गो नहि सज्जते’ (असङ्ग होनेके कारण आत्मा किसी पदार्थसे सम्बद्ध नहीं होता है) इत्यादि अनेक श्रुतियाँ चेतन ब्रह्ममें सर्वथा औदासीन्यका ही प्रतिपादन करती हैं।
यदि यह शङ्का हो कि अन्तःकरण ही सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका यदि आश्रय माना जाय, तो ‘मैं कर्ता हूँ’ ‘मैं भोक्ता हूँ’ इत्यादिरूपसे जो कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका चैतन्यके साथ सामानाधिकरण्य अनुभूत होता है, वह बाधित होगा, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अन्तःकरणका जो अध्यास हुआ है, वह चेतनके साथ तादात्म्यरूपसे हुआ है, अतः अन्तःकरणके धर्मोंका चैतन्यके सामानाधिकरण्य-रूपसे भान होता है †। यदि यह शङ्का हो कि कर्तृत्व आदि प्रपञ्चका आश्रय यदि अन्तःकरण ही है, तो चेतन आत्मा संसारका भागी नहीं होगा
† तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा चैतन्यरूप है, तथापि भेदकल्पनासे चैतन्य आत्माके धर्मरूपसे भासता है, वैसे ही आत्मा और अन्तःकरणका ऐकयाध्यास होनेसे उनके धर्मोंका अर्थात् चैतन्य, कर्तृत्व आदिका सामानाधिकरण्य भासता है इस प्रक्रियासे उक्त अनुभवके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है।