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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 413 of 590

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Page 413

जीवोपाधिभेद-विचार ] भाषानुवादसहित ३८३

स्याद् आत्मन्याभिमानिकसुखदुःखादिव्यवस्थैवमपि न सिध्यतीति वाच्यम्, आध्यासिकतादात्म्यापन्नान्तःकरणगतानर्थजातस्येव तद्गतपरस्परभेदस्यापि अभिमानत आत्मीयतया आत्मनो यादृशमनर्थभाक्त्वम्, तादृशेन भेदेन तद्व्यवस्थोपपत्तेः ।

एतेन सुखदुःखादीनामन्तःकरणधर्मत्वेऽपि तदनुभवः साक्षिरूप इति तस्यैकत्वात् सुखदुःखानुभवरूपभोगव्यवस्था न सिध्यतीति निरस्तम् ।

तत्तदन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या तत्तदन्तःकरणभेदेन भेदवत एव साक्षिणस्तत्तदन्तःकरणसुखदुःखानुभवरूपत्वेन तद्व्यवस्थाया अप्युपपत्तेरिति ।

आत्मामें आभिमानिक सुख, दुःख आदिकी व्यवस्था नहीं हो सकती है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासप्राप्त तादात्म्यसे युक्त अन्तःकरणमें रहनेवाले अनर्थ समुदायके समान उस अन्तःकरणमें रहनेवाले पारस्परिक भेद भी अभिमानसे आत्माके सम्बन्धी होते हैं अर्थात् आत्मामें आ जाते हैं, इसलिए आत्मामें जैसे अनर्थकी व्यवस्था होती है, वैसे ही अन्तःकरणके भेदसे जीवमें भेदकी व्यवस्था हो सकती है ।

यदि किसीको यह शङ्का हो कि भले ही सुख, दुःख आदि अन्तःकरणके धर्म हों, परन्तु अनुभव तो साक्षीरूप है, इसलिए साक्षीके एक होनेसे सुख-दुःखका अनुभव जो व्यवस्थितरूपसे देखा जाता है, वह नहीं * होगा ? तो यह शङ्का भी वक्ष्यमाण हेतुसे निरस्त हुई समझनी चाहिए, क्योंकि तत्-तत् अन्तःकरणके साथ तादात्म्यभावको प्राप्त हुआ साक्षी तत्-तत् अन्तःकरणोंके भेदसे भेदवान् होकर ही उन-उन अन्तःकरणोंमें रहनेवाले सुखदुःख आदिका अनुभवरूप होता है, इसलिए उक्त व्यवस्था भी उपपन्न हो † सकती है ।


मानने पर प्रतिशरीर बुद्धिके भेदसे बुद्धिगत धर्मोंकी व्यवस्था हो सकती है, परन्तु प्रतिशरीर आत्माका भेद न होनेसे आत्माके प्रपञ्चकी व्यवस्था नहीं हो सकती है ? यह शङ्काका भाव है, समाधानका यह भाव है कि बुद्धिगत संसारका जैसे आत्मामें आरोप होता है, वैसे बुद्धिमें रहनेवाले भेदका भी आत्मामें आरोप होता है, इसलिए उक्त अव्यवस्था नहीं है ।

* अर्थात् सुख और दुःखका अनुभव साक्षीरूप है, इसलिए उसके एक होनेसे देवदत्तका सुखानुभव यज्ञदत्तका भी सुखानुभव होगा, इस परिस्थितिमें जिस समय देवदत्तको सुखका अनुभव हुआ, उसी समयमें उसी देवदत्तके सुखानुभवको लेकर यज्ञदत्तको भी 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार अनुभव होना चाहिए, यह शङ्काका भाव है ।

† अर्थात् जैसे अन्तःकरणका भेद आत्मामें अध्यस्त होता है, वैसे ही उसका भेद साक्षीमें

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