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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 408 of 590

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Page 408

३७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद

वा सिद्धयभावेन योग्यतासमानसत्ताकस्यैव शब्दार्थसिद्धिनियमात् । अर्थाबाधरूपप्रामाण्यस्याऽसत्यत्वे अर्थस्य सत्यत्वायोगाच्च । तथा च ब्रह्मातिरिक्तसत्यवस्तुसत्त्वेन द्वैतावश्यम्भाव इति वियदादिप्रपञ्चोऽपि सत्योऽस्त्विति निरस्तम् ।

व्यावहारिकस्याऽर्थक्रियाकारित्वस्य व्यवस्थापितत्वेन व्यावहारिकयोग्यताया अपि सत्यब्रह्मसिद्धिसम्भवात् । ब्रह्मपरे वेदान्ते सत्यादिपदसत्त्वाद् ब्रह्मसत्यत्वसिद्धेः । अग्निहोत्रादिवाक्ये तादृशपदाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि प्रबलब्रह्माद्वैतश्रुतिविरोधात् तदसिद्धिरित्येव वैषम्योपपत्तेः । शब्दार्थयोग्यतयोः समानसत्ताकत्वनियमस्य निष्प्रमाणकत्वात् । घटज्ञान-


सिद्धि न होनेके कारण योग्यतासमानसत्ताक शब्दार्थकी ‡ सिद्धि होती है, यह नियम प्राप्त होता है और अर्थाबाधरूप * प्रामाण्यके असत्य होनेपर अर्थ भी सत्य नहीं हो सकता है, इस अवस्थामें ब्रह्मसे पृथक् योग्यता आदि अबाधित अर्थोका अस्तित्व होनेपर द्वैत ही सिद्ध होगा, इससे आकाशादि प्रपञ्चमें भी सत्यत्व प्रसक्त होगा ।

व्यावहारिक प्रपञ्चकी अर्थक्रियाकारिताका अद्वैतवादमें अङ्गीकार होनेसे उसी व्यावहारिक योग्यतासे सत्य—त्रिकालाबाधित—ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है । ब्रह्मपरक वेदान्तोंमें सत्यादि पदोंके होनेसे ब्रह्मकी सत्यता सिद्ध होती है । और 'अग्निहोत्रं जुहोति' इत्यादि वाक्योंमें सत्यादि पदोंके न रहनेसे अग्निहोत्रादि त्रिकालाबाधित सिद्ध नहीं होते हैं । यदि अग्नि होत्रादि प्रकरणमें सत्यादि पद हैं, तो भी प्रबल ब्रह्माद्वैत श्रुतिका विरोध होनेसे अग्निहोत्रादिकी सत्यता सिद्ध नहीं होती है, इस प्रकार वैषम्यकी उपपत्ति होती है । शब्दार्थ और योग्यताके समानसत्ताकत्वके नियममें कोई प्रमाण भी नहीं है । जैसे घट-


‡ जैसी योग्यताकी सत्ता होगी, वैसी ही सत्तासे युक्त शब्दार्थकी सिद्धि होगी, यह नियम अवश्य मानना चाहिए, अन्यथा प्रातिभासिक योग्यतावाले शब्दसे भी व्यावहारिक अर्थकी सिद्धि हो जायगी, यह भाव है ।

  • जिस ज्ञानके विषयका बाध होता है, वह ज्ञान प्रमाण नहीं माना जाता है, जैसे शुक्तिमें रजतज्ञान, अतः वही ज्ञान प्रमाण है, जिसका अर्थ बाधित न होता हो, इसलिए अर्थाबाध अर्थात् अबाधितार्थत्वरूप ही प्रामाण्य है, यह भाव है ।

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