सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context[मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७७
अशुक्तित्वस्य विरोधी, तत्रैव रजततादात्म्यं तन्निवर्त्यमरजतत्वाविरोधीति व्यवस्थादर्शनात् । एवं च प्रपञ्चमिथ्यात्वं कल्पितमपि प्रपञ्चसाक्षात्कार-निवर्त्यमिति सत्यत्वप्रतिक्षेपकमेव । ब्रह्मणः सप्रपञ्चत्वं तु ब्रह्मसाक्षात्कारा-निवर्त्यमिति न निष्प्रपञ्चत्वप्रतिक्षेकमिति ।
शाब्दप्रामाण्ययोग्यत्वसत्त्वं लौकिकमप्यलम् ॥ ५७ ॥
शाब्दज्ञान प्रामाण्य और शब्दकी योग्यता में व्यावहारिक सत्त्वसे भी पारमार्थिक ब्रह्मकी सिद्धि हो सकती है ॥५७॥
एतेन शब्दगम्यस्य ब्रह्मणः सत्यत्वे शब्दयोग्यतायाः, शाब्दधी-प्रामाण्यस्य च सत्यत्वं वक्तव्यम् । प्रातिभासिकयोग्यतावताऽनाप्तवाक्येन व्यावहारिकार्थस्य व्यावहारिकयोग्यतावताऽग्निहोत्रादिवाक्येन तात्त्विकार्थस्य
अशुक्तित्वका—रजतत्वका—विरोधी है, और इसी स्थलमें जो रजततादात्म्य है, वह शुक्तिके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, अतः शुक्तित्वका विरोधी नहीं हो सकता है। ऐसा होनेपर यद्यपि प्रपञ्चका मिथ्यात्व कल्पित है, तथापि प्रपञ्चसाक्षात्कार-से निवृत्त नहीं होता है, इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंसे स्वाश्रय साक्षात्कारसे अनिवर्त्य धर्म स्वाश्रयमें अपनेसे विरुद्ध धर्मकी स्थितिमें विरोधी है ऐसा निश्चित होनेपर सत्यत्वका विरोधी ही है, ब्रह्मका प्रपञ्चतादात्म्य ब्रह्मके साक्षात्कारसे निवृत्त होता है, इससे प्रपञ्चतादात्म्य निष्प्रपञ्चत्वका विरोधी नहीं है।
इसीसे अर्थात् वक्ष्यमाण हेतुसे यह भी शङ्का निरस्त हुई कि यदि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे ज्ञेय ब्रह्म सत्य है, तो शब्दकी योग्यताको † और शब्दज्ञानके प्रामाण्यको भी सत्य कहना चाहिए, क्योंकि प्रातिभासिक योग्यतासे युक्त अनाप्त पुरुषके वाक्यसे व्यावहारिक अर्थ और व्यावहारिक योग्यतावाले 'अग्निहोत्रं जुहोति' (अग्निहोत्र होम करे) इत्यादि वाक्योंसे तात्त्विक अर्थकी
† बाध निश्चयका अभाव योग्यता है, वह शाब्दबोधमें कारण है। जैसे 'जलेन सिञ्चति' जलसे सिञ्चन करता है, इत्यादि स्थलमें सिञ्चनकरणताके बाधका निश्चय नहीं है, अतः इससे शाब्दबोध होता है और 'वह्निना सिञ्चति' (अग्निसे सिञ्चन करता है) इस स्थलमें वह्निमें सिञ्चन-करणताका बाध निश्चित है, इसलिए इस वाक्यसे शाब्द बोध नहीं होता है। प्रकृतमें जिस उपनिषद् वाक्यसे ब्रह्मका बोध होगा उस उपनिषद्-वाक्यकी योग्यता अवश्य अपेक्षित है, अन्यथा उससे ब्रह्मज्ञान हो ही नहीं सकेगा, इस परिस्थितिमें द्वैतापत्ति दोष देते हैं ।