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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 409 of 590

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Page 409

मिथ्यात्वके मिथ्या होनेपर प्रपञ्चमिथ्यात्वप्रकार-विचार] भाषानुवादसहित ३७९

प्रामाण्यस्याऽघटत्ववत् सत्यभूतब्रह्मज्ञानप्रामाण्यस्याऽपि तदतिरिक्तघटितत्वेन मिथ्यात्वोपपत्तेश्च। तस्माद् (उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६) आरम्भणाधिकरणोक्तन्यायेन कृत्स्नस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं वज्रलेपायते ॥ ९ ॥

न जीवैः सद्वितीयत्वं ब्रह्मणस्तदभेदतः ।
तेषां च भोगसाङ्कर्यं वारणीयमुपाधिभिः ॥ ५८ ॥

जीवों को लेकर ब्रह्ममें द्वैतत्व प्रसक्त नहीं होता, क्योंकि जीव ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, और उनके भोगके साङ्कर्य का परिहार उपाधिके आधारपर करना चाहिए ॥ ५८ ॥

ननु आरम्भणशब्दादिभिरचेतनस्य वियदादिप्रपञ्चस्य मिथ्यात्व-सिद्धावपि चेतनानामपवर्गभाजां मिथ्यात्वायोगाद् अद्वितीये ब्रह्मणि

ज्ञानके प्रामाण्यमें अघटत्वका, वैसे ही सत्यात्मक ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यमें * ब्रह्म-भिन्न ब्रह्मत्वका सम्बन्ध होनेसे मिथ्यात्वकी उपपत्ति है। इससे आरम्भणाधिकरणमें † कहे गये सिद्धान्तके अनुसार सम्पूर्ण आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या ही है ॥९॥

यदि यह शङ्का हो कि आरम्भणाधिकरणके सिद्धान्तके अनुसार अचेतन आकाश आदि प्रपञ्च मिथ्या हो सकता है, परन्तु मुक्त चेतन जीवोंमें मिथ्यात्व-का सम्बन्ध न होनेसे अद्वितीय ब्रह्ममें समन्वय नहीं हो सकता है, और पूर्वमें


* ब्रह्मत्वाधिकरण ब्रह्ममें ब्रह्मत्वप्रकारक अनुभवत्वरूप जो ब्रह्मज्ञानका प्रामाण्य है, वह ब्रह्मसे भिन्न ब्रह्मत्वके सम्बन्धसे युक्त है, अतः वह भी मिथ्या ही है, यह भाव है। यदि कहा जाय कि ब्रह्मज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य अबाधितार्थानुभवत्वरूप है, और केवल योग्य विषयस्वरूपमें उसका पर्य्यवसान है। वह प्रामाण्य अखण्डार्थक वेदान्तोंमें ब्रह्मरूप ही है, तदतिरिक्त घटित नहीं है, इसलिए वह सत्य ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उसके सत्य होनेपर भी कोई दोष नहीं है, कारण कि वह केवल ब्रह्मस्वरूप ही है, अतः इससे भी ब्रह्मातिरिक्त सत्य वस्तुकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह भाव है।

† तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः 'ब्रह्मरूप अभिन्ननिमित्तोपादान कारणसे यह कार्य अलग नहीं है' क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेव सत्यम्' 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' 'ब्रह्मैवेदम्' (विकार केवल वाचारम्भण ही है मृत्तिका सत्य है—अर्थात् कारण सत्य है, यह सब सत्य-रूप है, यह सब ब्रह्म ही है) इत्यादि श्रुति प्रमाण है, यह सूत्रका अर्थ है। इसका अधिक विस्तार अच्युतग्रन्थमालामुद्रित ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यरत्नप्रभा भाषानुवादमें देखना चाहिए [पृ० १००० द्वितीय खण्ड]।

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