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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 406 of 590

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Page 406
३७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

प्रपञ्चसत्यत्वस्य पारमार्थिकत्वं स्यादिति निरस्तम् । धर्मिसमसत्ताकस्य मिथ्यात्वस्य व्यावहारिकत्वे धर्मिणोऽपि व्यावहारिकत्वनियमात् ।

स्वधर्मीक्षाऽक्षतो धर्मः स्वविरुद्धहरोऽथवा ॥

अथवा अपने धर्मीके साक्षात्कारसे निवृत्त न होनेवाला धर्म अपने विरुद्ध धर्मका अपहरण करता है ।

अथवा यो यस्य स्वविषयसाक्षात्कारानिवर्त्यो धर्मः, स तत्र स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकः । शुक्तौ शुक्तितादात्म्यं तद्विषयसाक्षात्कारानिवर्त्यम्


होगा, क्योंकि धर्मीके समान सत्तावाले मिथ्यात्वके व्यावहारिक होनेपर धर्मी भी व्यावहारिक ही होता है, ऐसा नियम है ।

अथवा * जिसका जो धर्म अपने विषयके साक्षात्कारसे निवृत्त न होता हो, वह धर्म उस धर्मीमें अपने विरुद्ध धर्मका प्रतिक्षेपक होता है अर्थात् अपने विरुद्ध धर्मकी स्थिति नहीं होने देता है, यह भाव है । शुक्तिमें रहनेवाला शुक्तितादात्म्य शुक्तिविषयक साक्षात्कारसे निवृत्त नहीं होता है, इसलिए वह


हैं। इस परिस्थितिमें प्रपञ्चगत सत्यत्व जब पारमार्थिक है, तो उसका धर्मी प्रपञ्च भी पारमार्थिक अवश्य हो सकता है, अतः ब्रह्माद्वैतकी क्षति होगी, इस प्रश्नका समाधान 'अतएव' इस ग्रन्थसे किया जाता है। तात्पर्य यह है कि मिथ्यात्वरूप धर्ममें धर्मिसमानसक्ताकत्वके आधारपर व्यावहारिकत्वका अङ्गीकार करके मिथ्यात्वाश्रय प्रपञ्चमें सत्यत्वपर्यवसायी पारमार्थिकत्वका आपादन, विरोध होनेके कारण, हो ही नहीं सकता है। यदि प्रपञ्चमें अनुभूयमानसत्यत्वका व्यावहारिकरूपसे अङ्गीकार किया जाय, तो भी कोई हानि नहीं है। यदि शङ्का हो कि समानसत्तावाले मिथ्यात्व और सत्यत्व एक जगहपर रहेंगे कैसे ? क्योंकि उनका विरोध है; वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जब तक तत्त्वज्ञान न हो, तब तक बाधित न होनेवाले प्रत्यक्षका विषय, तथा मिथ्यात्वका अविरुद्ध सत्यत्व प्रपञ्चमें रहता है, ऐसा बार बार पूर्वमें कहा गया है, यह भाव है।

※ इस पक्षका अवलम्बन करनेवालोंका मत है कि सर्वत्र ब्रह्मसत्ता ही प्रतीत होती है, उससे भिन्न व्यावहारिक अथवा प्रातिभासिक सत्ता है ही नहीं, इसलिए 'धर्मिसमानसक्ताकत्व' आदिसे कहा गया समाधान युक्त नहीं है, अतः स्वाभिमत समाधान 'अथवा' इस ग्रन्थसे कहते हैं। तात्पर्य यह है कि वही धर्म अपने विरोधी धर्मकी स्थितिका निवर्तक होता है, जो अपने आश्रयके प्रत्यक्षसे निवृत्त न होता हो, इसलिए स्वाश्रयसाक्षात्कारानिवर्त्यत्व ही धर्मके स्वविरुद्धधर्मप्रतिक्षेपकत्वमें प्रयोजक है, यह फलित है। पारमार्थिकत्व या धर्मिसमानसक्ताकत्व प्रयोजक नहीं है, शुक्ति रजतमस्थलमें शुक्तित्व धर्मकी शुक्तिका साक्षात्कार होनेपर भी निवृत्ति नहीं होती है, इसलिये शुक्तित्व धर्म अशुक्तित्वविरोधी है, यह सर्वानुभवसिद्ध है, अतः इस प्रयोजकके स्वीकार करनेमें विरोध नहीं है, यह भाव है।