सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextमिथ्या पदार्थोंकी अर्थक्रियाकारिताका उपपादन-विचार] भाषानुवादसहित ३६७
असत्यैव, किन्तु जाग्रज्जलादिसाध्या सा सत्या ? अविशिष्टमुभयत्रापि स्वसमानसत्कार्थक्रियाकारित्वमिति केचित् ।
स्वप्नोत्थभयकम्पादेर्जागरेऽप्यनुवर्तनात् ।
अद्वैतविद्याचार्याणां समसत्ता न सम्मता ॥ ५१ ॥
स्वप्नसे जागनेवाले मनुष्यके भय, कम्प आदि जागरणमें देखे जाते हैं, अतः अद्वैतविद्याचार्य समसत्ताक अर्थक्रिया नहीं मानते हैं ॥५१॥
अद्वैतविद्याचार्यास्त्वाहुः—स्वाप्नपदार्थानां न केवलं प्रबोधबाध्यार्थक्रियामात्रकारित्वम् । स्वाप्नाङ्गनाभुजङ्गमादीनां तदबाध्यसुखभयादिजन-
है ? तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे प्रश्न करनेवालोंसे यह पूछा जा सकता है कि क्या जाग्रत्कालीन जलादिसे साध्य अवगाहनादि अर्थक्रिया सत्य है ? अर्थात् उसे भी सत्य नहीं मान सकते हैं, इसलिए सत्यार्थक्रियाकारित्वसे भी प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं कर सकते हैं। स्वसमानसत्ताक ‡ अर्थक्रियाकारित्व तो स्वप्न और जाग्रत् दोनोंमें समान है, [ परन्तु इससे प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है ] ।
* पूर्वोक्त आक्षेपके समाधानमें अद्वैतविद्याचार्य कहते हैं—स्वप्नकालीन पदार्थोंकी केवल वही अर्थक्रियाकारिता नहीं है, जो कि प्रबोधसे बाधित होती
‡ तात्पर्य यह है कि केवल अर्थक्रियाकारिता सत्यत्वप्रयोजक नहीं है, परन्तु सत्यार्थक्रियाकारिता ही सत्यत्वकी प्रयोजक है। आकाश, घट आदिकी अर्थक्रिया सत्य है, इसलिए वे आकाशादि मिथ्या नहीं हो सकते हैं, स्वाप्न जलादिकी अर्थ क्रिया असत्य है, अतः उनमें सत्यत्व सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः घटादि प्रपञ्च सत्य है, सत्यार्थक्रियाकारी होनेसे इस अनुमानसे प्रपञ्चमें सत्यत्व सिद्ध हो सकता है, तथापि यह असङ्गत है, क्योंकि जाग्रत्कालीन अर्थोकी अर्थक्रिया भी सत्य—त्रिकालाबाधित—नहीं है, अतः उसे नहीं मान सकते हैं। अर्थक्रियाकारिता, तो दोनोंमें समान है।
* अद्वैतविद्याचार्यके मतमें स्वप्नकालीन पदार्थोंकी भी अर्थक्रिया सत्य मानी गई है, अतः पूर्व मतोंसे इसमें वैलक्षण्य है। तात्पर्य यह है कि प्रबोधसे बाध्य अर्थक्रिया प्रातिभासिक अर्थक्रिया होती है, और जो प्रबोधसे बाधित अर्थक्रिया नहीं होती है, वह भले ही स्वप्नकालीन क्यों न हो परन्तु अप्रातिभासिक—सत्य—ही अर्थक्रिया होती है। इसलिए स्वप्नकालके सभी पदार्थोंमें असत्य अर्थक्रियाकारिता नहीं रहती है, किन्तु व्यावहारिक अर्थक्रियाकारित्व भी रहता ही है। क्योंकि स्वप्नाङ्गना आदिसे ऐसे सुख आदि होते हैं, जिनका जागरणमें बाघ नहीं होता है, इसी प्रकार व्यावहारिक पदार्थोंमें व्यावहारिकार्थक्रियाकारिता