सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context३६६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
करणत्वादिकल्पनाभङ्गप्रसङ्गेन प्रौढिवादत्वस्य स्फुटत्वादिति रामाद्व-
याचार्याः ॥ ७ ॥
ननु प्रपञ्चो मिथ्यात्वात् कथमर्थक्रियाक्षमः ।
यदि शङ्का हो कि प्रपञ्च मिथ्या होनेसे अर्थक्रियामें समर्थ कैसे होगा ?
(८) ननु दृष्टिसृष्टिवादे, सृष्टिदृष्टिवादे च मिथ्यात्वसम्प्रतिपत्तेः कथं मिथ्याभूतस्याऽर्थक्रियाकारित्वम् ?
केचित् स्वप्नवदत्राऽऽहुः समसत्ताकतत्क्रियाम् ॥ ५० ॥
उक्त शङ्काके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नके समान जागरणमें भी समानसत्ताक अर्थक्रिया होगी ॥५०॥
स्वप्नवदिति ब्रूमः । ननु स्वाप्नजलादिसाध्यावगाहनादिरूपाऽर्थक्रिया
कारणत्रयसम्पादक ग्रन्थकी प्रौढिवादिता स्पष्ट है, [ यदि उसे प्रौढिवाद न माना जाय, तो चैतन्यके प्रमाकरण होनेसे वेदान्त ही ब्रह्मप्रमाके करण हैं, इत्यादि कल्पनाका भङ्ग होगा ] ॥७॥
अब * शङ्का होती है कि दृष्टि-सृष्टिवादमें और सृष्टि-दृष्टिवादमें प्रपञ्चके मिथ्यात्वका अङ्गीकार होनेसे मिथ्याभूत प्रपञ्च अर्थक्रियाकारी कैसे होगा ?
इस † आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि स्वप्नके समान जाग्रत्में अर्थक्रियाकारित्व हो सकता है, अर्थात् जैसे मिथ्याभूत स्वाप्न जलमें स्नान आदि अर्थक्रिया देखी जाती है, परन्तु उन पदार्थोंमें सत्यत्व नहीं है, वैसे ही उक्त दो वादोंमें प्रपञ्चके सत्य न होनेपर भी अर्थक्रिया हो सकती है, यह भाव है । यदि शङ्का हो कि स्वप्नके जल आदिसे होनेवाली अवगाहन आदि अर्थक्रिया असत्य ही है, सत्य नहीं है, जाग्रत्में अवगाहनादि अर्थ सत्य
* अर्थक्रियाकारित्व प्रपञ्चके पारमार्थिकत्वमें प्रयोजक नहीं है, ऐसा पूर्वमें कहा जा चुका है, परन्तु शङ्का करनेवाला कहता है—वह अयुक्त है, क्योंकि जो मिथ्याभूत पदार्थ है, उसमें अर्थक्रियाकारित्व रह नहीं सकता है, कारण कि मिथ्याभूत शुक्तिरजतसे कटक आदि अर्थ-क्रिया नहीं देखी जाती है, अतः प्रपञ्च मिथ्या नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका अभिप्राय है ।
† अर्थक्रियाकारित्व हेतुसे भी प्रपञ्चमें सत्यत्वका साधन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि स्वाप्न पदार्थोंमें व्यभिचार है, यह इस ग्रन्थसे कहा जाता है ।