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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 398 of 590

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Page 398

३६८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

कत्वस्यापि दर्शनात् । स्वाप्नविषयजन्यस्यापि हि सुखभयादेः प्रबोधानन्तरं न बाधोऽनुभूयते, प्रत्युत प्रबोधानन्तरमपि मनःप्रसादशरीरकम्पनादिना सह तदनुवृत्तिदर्शनात् प्रागपि सत्त्वमेवाऽवसीयते । अत एव प्राणिनां पुनरपि सुखजनकविषयगोचरस्वप्ने वाञ्छा, अतादृशे च स्वप्ने प्रद्वेषः । सम्भवति च स्वप्नेऽपि ज्ञानवद् अन्तःकरणवृत्तिरूपस्य सुखभयादेरुदयः । न च स्वाप्नाङ्गनादिज्ञानमेव सुखादिजनकम्, तच्च सदेवेति वाच्यम्, तस्यापि


है, क्योंकि स्वप्नकालीन अङ्गना, भयङ्कर सर्प आदिसे जागरणमें बाधित न होनेवाले सुख, भय आदि भी देखे जाते हैं । यद्यपि स्वाप्निक अङ्गना आदि विषयोंसे आनन्द और भय आदि उत्पन्न हुये हैं, तथापि उनका 'स्वप्नमें सुख, भय आदि मुझे नहीं हुए' इस प्रकार प्रबोधमें बाध नहीं देखा जाता है, प्रत्युत उठनेके बाद भी मनकी † प्रसन्नता और शरीरके कम्प आदिके साथ सुखादिकी अनुवृत्ति देखी जाती है, अतः उठनेके पूर्वमें भी उनकी सत्ता निश्चित होती है । इसीसे आनन्दप्रद विषयोंसे युक्त स्वप्नकी प्राणियोंको फिर भी इच्छा होती है और जो स्वप्न सुखप्रद विषयोंसे युक्त नहीं है, उसकी इच्छा नहीं होती है—उसमें द्वेष होता है । ‡ स्वप्नमें ज्ञानके समान अन्तःकरणके वृत्तिरूप सुख, भय आदि उत्पन्न होते हैं । यदि शङ्का हो कि स्वप्नकालिक अङ्गना आदिका ज्ञान ही सुख आदिका कारण है, और वह ज्ञान तो सत्य ही है, इसलिए कोई अनुपपत्ति


सिद्ध हो सकती है, इसलिए अर्थक्रियाकारिताकी मिथ्यात्वपक्षमें अनुपपत्ति नहीं हो सकती है, यह भाव है ।

† सुखानुभवसे मनःप्रसाद हुआ करता है और भय या दुःखके अनुभवसे शरीरकम्प आदि हुआ करता है, इन्हींसे ज्ञात होता है कि जागनेके बाद भी सुख, भय आदिकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए उनकी जाग्रत्कालमें अनुवृत्ति होनेसे प्रबोधके पूर्वमें भी उनकी सत्यता साबित होती है, यह भाव है । इस विषयमें अनुमान भी करते हैं—स्वप्नकालीन भय और सुख आदि, जाग्रत् सुख आदिके समान व्यावहारिक सत्य हैं, प्रातिभासिक नहीं हैं, क्योंकि प्रबोधके बाद भी उनका बाध नहीं होता है और जाग्रत्कालमें उनकी अनुवृत्ति भी होती है ।

‡ 'तदेतत्सत्त्वम् येन स्वप्नं पश्यति' इस श्रुतिके आधारपर कल्पतरूकारने मानसवृत्तिरूप ज्ञान. स्वप्नमें माना है, इसी प्रकार मानसवृत्तिरूप अन्तःकरण वृत्तिरूप—भय आदि भी व्यावहारिक हो सकते हैं, यह भाव है ।

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