सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३६२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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अन्यस्तु दृष्टिरैव विश्वसृष्टिः । दृश्यस्य दृष्टिभेदे प्रमाणाभावात् ।
‘ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुर्जगदेतद्विचक्षणाः ।
अर्थस्वरूपं भ्राम्यन्तः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः ॥’
इति स्मृतेश्चेति सिद्धान्तमुक्तावल्यादिदर्शितो दृष्टिसृष्टिवादः।
सृष्टिदृष्टिं परे प्राहुः संस्काराद्यनपेक्षणात् ॥
तथाऽपि विश्वं मिथ्यैव बाध्यत्वाच्छ्रुतिमानतः ॥४६॥
यद्यपि संस्कार आदिकी अपेक्षा न होनेके कारण कुछ लोग सृष्टिदृष्टिवादका ही आश्रयण करते हैं, तथापि श्रुति बाधित होनेसे संसार मिथ्या है ॥४६॥
द्विविधेऽपि दृष्टिसृष्टिवादे मनःप्रत्ययमलभमानाः केचिदाचार्याः सृष्टिदृष्टिवादं रोचयन्ते । श्रुतिदर्शितेन क्रमेण परमेश्वरसृष्टमज्ञातसत्तायुक्तमेव विश्वं तत्तद्विषयप्रमाणावतरणे तस्य तस्य दृष्टिसिद्धिरिति ।
* सिद्धान्तमुक्तावली आदिमें दूसरे ही दृष्टिसृष्टिवादका निरूपण किया गया है—दृष्टि ही विश्वसृष्टि है, [अर्थात् स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपा दृष्टि ही प्रपञ्चकी सृष्टि है, दृष्टिसमकालीन अन्य प्रपञ्चकी सृष्टि नहीं है, क्योंकि] दृश्य पदार्थको स्वप्रकाशज्ञानस्वरूपसे पृथक् माननेमें कोई प्रमाण नहीं है, और इस अर्थकी प्रतिपादिका स्मृति भी है कि विवेकी पुरुष इस प्रत्यक्षसिद्ध जगत्को ज्ञानात्मक ही कहते हैं, परन्तु कुछ कुदृष्टि-भ्रान्त पुरुष—इसी ज्ञानरूप जगत्को ज्ञानसत्तासे भिन्न देखते हैं ।
उक्त दो प्रकारके दृष्टिसृष्टिवादमें विश्वास न रखते हुए† कुछ आचार्य सृष्टिदृष्टिवादमें अपनी अभिरुचि रखते हैं । श्रुतिमें बतलाये गये क्रमके अनुसार परमेश्वरसे बना हुआ जगत् अज्ञात सत्तासे ही युक्त है, और उन-उन विषयोंमें प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेपर उन-उन विषयोंका ज्ञान सिद्ध होता है ।
* द्रष्टव्य—जीवानन्द विद्यासागर द्वारा कलकत्तामें मुद्रित सिद्धान्तमुक्तावलीके ३१५ वें पेजमें इस दृष्टिसृष्टिवादका विस्तारसे वर्णन किया गया है—कोऽयं विकारः द्वैतं तद्दृष्टिर्वा? इत्यादिसे ।
† मनःप्रत्ययशब्दका अर्थ है—विश्वास अर्थात् दृष्टिसृष्टिवादमें प्रामाणिकत्वका निश्चय नहीं है, इसमें हेतु यह है कि जाग्रत्प्रपञ्चमें प्रातिभासिकत्वका अङ्गीकार, आकाश आदि सृष्टिका अपलाप, कर्मोपासनाकाण्डमें वर्णित अर्थोंके अनुष्ठानसे होनेवाले स्वर्ग आदिका अपलाप आदि। अतः सृष्टिदृष्टिवाद ही युक्त है अर्थात् श्रुतिमें जिस आकाशादिक्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है, उसी