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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 391 of 590

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Page 391

सृष्टिके कल्पकका विचार ] भाषानुवादसहित ३६१


ज्योतिष्टोमादिश्रुतिबोधितानुष्ठानात् फलसिद्धिः स्वाप्नश्रुतिबोधिता-
नुष्ठानप्रयुक्तफलसंवादतुल्या । ज्योतिष्टोमादिश्रुतीनां च सत्त्वशुद्धिद्वारा
ब्रह्मणि तात्पर्यान्नाऽप्रामाण्यमित्यादिदृष्टिसृष्टिव्युत्पादनप्रक्रियाप्रपञ्चस्त्वाकर-
ग्रन्थेषु द्रष्टव्यः । अयमेको दृष्टिसमसमया विश्वसृष्टिरिति दृष्टिसृष्टिवादः ।

दृष्टिरेव हि विश्वस्य सृष्टिरित्यपरा विधा ॥
ज्ञानस्वरूपमेवाऽऽहुरित्येतत्स्मृतियायिनः ॥४५॥

स्मृत्यनुसारी कुछ लोग दृष्टि ही संसारसृष्टि है, ऐसा दृष्टिसृष्टिका अन्य प्रकार है और यह संसार ज्ञानस्वरूप है, ऐसा कहते हैं ॥४५॥


श्रुतियोंका स्वार्थमें तात्पर्य मानकर ही वियत्पाद और प्राणपादमें विरोधका समाधान किया गया है, क्योंकि सृष्टिप्रतिपादक श्रुतियोंका तात्पर्य वस्तुतः ब्रह्मात्मैक्यमें ही होनेसे सृष्टिके प्रतिपादनमें उनका अभिप्राय है ही नहीं ) ।

'ज्योतिष्टोमेन यजेत स्वर्गकामः' ( स्वर्गको † चाहनेवाला ज्योतिष्टोम याग करे ) इत्यादि श्रुतियोंसे प्रतिपादित अनुष्ठानसे स्वर्गरूप फलकी सिद्धि वैसी ही है, जैसी कि स्वप्नावस्थामें उक्त श्रुतिकी कल्पना करके उससे ज्योतिष्टोम आदिका परिज्ञान प्राप्त कर उसके अनुष्ठानसे फलकी प्राप्ति हो अर्थात् जैसे पुरुष स्वप्नकालमें परिकल्पित श्रुतियोंसे स्वर्ग आदिके साधनविशेषोंको जानकर उनके अनुष्ठानसे मिथ्या ही फल प्राप्त करता है, वैसे ही जागरणमें भी उन श्रुतियोंसे साधनविशेषोंकी अवगति द्वारा उनका अनुष्ठान करके मिथ्या स्वर्गादि फल प्राप्त करता है, यह भाव है । और अन्तःकरणकी शुद्धि द्वारा ज्योतिष्टोमादि यागकी प्रतिपादक श्रुतियाँ‡ ब्रह्मका ही परिज्ञान कराती हैं, अतः वे निष्प्रमाण नहीं हैं, इत्यादि दृष्टिसृष्टिवादका विवेचन-प्रकार आकर ग्रन्थोंमें देखना चाहिए । एक यह—दृष्टि समकालीन ही संसारकी उत्पत्ति है, इस प्रकारका—दृष्टिसृष्टिवाद है ।


† 'यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतञ्च तत्सुखं स्वःपदास्पदम्' अर्थात् जिस सुखमें दुःखकी मात्रा न हो, जिसका नाश न हो—जो चिरस्थायी हो और जो इच्छानुसार प्राप्त होता हो, वह सुख स्वर्गशब्दसे कहा जाता है ।

‡ कर्मप्रतिपादक वाक्योंसे और उपासनाप्रतिपादक वाक्योंसे विहित कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करनेवाले पुरुषका ही चित्त शुद्ध होता है, शुद्धचित्त अधिकारी पुरुषको वेदान्त-शास्त्र ब्रह्मज्ञान कराता है, अतः कर्मकाण्ड और उपासनाकाण्ड अधिकारित्वकी प्राप्ति द्वारा ब्रह्मज्ञानके ही अङ्ग हैं, इसलिए उन दोनों काण्डोंका भी ब्रह्ममें ही तात्पर्य है, स्वर्गसाधनत्वरूप स्वार्थमें नहीं है, अतः उनमें अप्रामाण्य शङ्का नहीं है, यह भाव है ।

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