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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 393 of 590

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Page 393

सृष्टिके कल्पकका विचार] भाषानुवादसहित ३६३

न चैवं प्रपञ्चस्य कल्पितत्वाभावे श्रुत्यादिप्रतिपन्नस्य सृष्टिप्रलयादिमतः प्रत्यक्षादिप्रतिपन्नार्थक्रियाकारिणश्च तस्य सत्यत्वमेवाऽभ्युपगतं स्यादिति वाच्यम्, शुक्तिरजतादिवत् सम्प्रयोगसंस्कारदोषरूपेण, अधिष्ठानज्ञानसंस्कारदोषरूपेण वा कारणत्रयेणाऽजन्यतया कल्पनासमसमयत्वाभावेऽपि ज्ञानैकनिव-


यदि शङ्का हो कि * उक्त रीतिसे प्रपञ्चको यदि कल्पित न माना जाय, तो श्रुति, स्मृति आदिसे ज्ञात सृष्टि, प्रलय आदिसे युक्त तथा प्रत्यक्ष प्रमाणसे ज्ञात अर्थक्रियाकारित्वसे युक्त संसारमें सत्यता ही स्वीकृत होगी ? तो यह शङ्का † युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि शुक्ति-रजत आदिके समान सम्प्रयोग, संस्कार और दोषरूप अथवा अधिष्ठानज्ञान, संस्कार और दोषरूप तीन कारणोंसे जन्य न होनेके कारण वियदादि प्रपञ्च कल्पनासमानकालीन नहीं है, तथापि ‡


क्रमसे परमेश्वरसे सृष्टि उत्पन्न होती है, और वह अज्ञात सत्तावाली है, तत्-तत् विषयोंमें तत्-तत् प्रमाणोंकी प्रवृत्ति होनेके अनन्तर आवरणभङ्ग द्वारा तत्-तत् विषयोंका अपरोक्षावभास (दृष्टि) होता है, अतः दृष्टि ही सृष्टि नहीं है, यह सृष्टिदृष्टिवादियोंका भाव है।

* शङ्काका तात्पर्य यह है कि सृष्टिदृष्टिवादके अनुसार प्रपञ्च कल्पित न माना जाय, तो प्रपञ्च सत्य ही सिद्ध होगा, क्योंकि प्रपञ्च सत्य है, श्रुतिसिद्ध होनेसे, ब्रह्मके समान, यह अनुमान प्रमाण है। यद्यपि प्रपञ्च स्वरूपतः प्रत्यक्षसे सिद्ध है, तथापि सृष्टि, प्रलय आदियुक्तत्वरूपसे श्रुति, स्मृति आदिसे ही सिद्ध है, इसी प्रकार प्रपञ्च सत्य है, अर्थक्रियाकारी होनेसे, सृष्टि आदि अर्थक्रिया-कारी ब्रह्मके समान, यह हेतु स्वरूपासिद्ध भी नहीं है, क्योंकि पृथ्वी, जल आदिमें उक्त हेतु प्रत्यक्षसे सिद्ध ही है।

† समाधानका तात्पर्य यह है—यद्यपि आकाशा आदि प्रपञ्चमें कल्पना-समान-कालिकत्व नहीं है, जिसे कि दृष्टिदृष्टिवादियोंने माना है, क्योंकि वहींपर कल्पनासमानकालिकत्व होता है, जहाँपर सम्प्रयोग आदि कारणत्रयजन्यत्व रहता है, तथापि पारमार्थिक सत्यत्वसे विरुद्ध मिथ्यात्व, जिसका (तीन प्रकारोंसे मूलमें निर्वचन किया है) वियदादि प्रपञ्चमें वर्तमान है, अतः इस वादमें भी प्रपञ्च पारमार्थिक सत्य नहीं हो सकता है।

‡ केवल ज्ञाननिवर्त्यत्व—जिसका बाध केवल अधिष्ठानतत्त्वसाक्षात्कार हीसे हो, वह मिथ्यात्व है। जैसे शुक्तिमें उत्पन्न रजतकी निवृत्ति शुक्तिरूप अधिष्ठानके तत्त्वसाक्षात्कारसे होती है, अतः वह मिथ्या है।

सदसद्विलक्षणत्व—जो सत् (त्रिकालावाधित) से और असत् (किसी समयमें भी प्रतीत न होनेवाले) से विलक्षण हो, वह मिथ्या है, जैसे शुक्तिरजत न सत् है और न शशशृङ्गके समान असत् है, अतः शुक्तिरजत मिथ्या है। केवल सद्विलक्षणको मिथ्या कहनेसे असत् शशशृङ्गमें दोष होगा और असद्विलक्षणमात्र कहनेसे ब्रह्ममें अतिव्याप्ति होगी, इसलिए सदस-द्विलक्षण मिथ्याका लक्षण कहा गया है।