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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 383 of 590

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Page 383

स्वाप्न पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५३


वृत्त्यभावपक्षे इहापि स्वाप्नगजादिभासकचैतन्योपाधिभूतस्वप्नावस्थाविनाश-
रूपसंस्कारादनुसन्धानोपपत्तेश्च ।
अथवा 'तदेतत् सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति' इत्यादिश्रुतेरस्तु स्वप्नेऽपि
कल्पतरूक्तरीत्या स्वाप्नगजादिगोचरान्तःकरणवृत्तिः । न च तावता
परिशेषासिद्धिः । अन्तःकरणस्य 'अहम्' इति गृह्यमाणस्य सर्वात्मना जीवै-
क्येनाऽध्यस्ततया लोकदृष्ट्या तस्य तद्व्यतिरेकाप्रसिद्धेः परिशेषार्थं चक्षुरा-
दिव्यापाराभावमात्रस्यैवाऽपेक्षितत्वात् । 'प्रसिद्धदृश्यमात्रं दृगवभासयोग्यम्'
इति निश्चयसत्त्वेन परिशेषार्थमन्यानपेक्षणात् ।


होता है, इस प्रकार वेदान्तकौमुदीमें स्वीकृत सुषुप्तिमें अविद्यावृत्तिके अभाव-पक्षमें स्वप्नावस्थामें भी स्वाप्न गज आदिके अवभासक चैतन्यके उपाधिभूत स्वप्नावस्थाके विनाशसे उत्पन्न संस्कारसे स्मरणकी उपपत्ति हो सकती है ।

अथवा 'तदेतत् सत्त्वम्०' ( वही सत्त्व—अन्तःकरण है, जिससे स्वप्न देखा जाता है ) इत्यादि श्रुतिसे * कल्पतरुकारके कथनानुसार स्वाप्न रथ, गज आदि पदार्थोंको विषय करनेवाली अन्तःकरणकी वृत्ति रहे तो भी कोई हानि नहीं है । यदि शङ्का हो कि स्वप्नमें यदि अन्तःकरणकी अवस्थिति मानी जाय, तो परिशेषकी असिद्धि होगी ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहम्' रूपसे गृह्यमाण अन्तःकरणके सर्वात्मना जीवतादात्म्यरूपसे अध्यस्त होनेसे व्यवहारदृष्टिसे अन्तःकरणमें जीवभेदकी असिद्धि होनेके कारण परिशेषके लिए चक्षु आदि बाह्य करणोंके व्यापारका अभावमात्र ही अपेक्षित है; कारण कि प्रसिद्ध दृश्यमात्र पदार्थ द्रष्टाके अवभासयोग्य हैं, इस प्रकार निश्चय होनेसे परिशेषके लिए अन्य चक्षु आदि व्यापारकी अपेक्षा नहीं होती है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि जागरणके समान स्वप्नमें भी गज आदि स्वाप्न पदार्थोंका अवगाहन करनेवाली वृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, इसीसे जाग्रत् होनेपर संस्कार द्वारा सुषुप्तिके अज्ञान आदिके


* कल्पतरुकारने कहा है कि सत्त्वशब्दसे कहलानेवाले अन्तःकरणकी तृतीया श्रुतिसे स्वाप्नगजादिविषयकज्ञानकरणता है, इसलिए श्रुतिके आधारसे ( तदेतत् इत्यादि श्रुतिसे ) स्वप्नमें चाक्षुषवृत्तिके न होनेपर भी मानसवृत्ति है, अतः संस्कारकी अनुपपत्ति नहीं है, यह भाव है ।
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