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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 382 of 590

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Page 382
३५२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

ननु स्वप्ने चक्षुराद्युपरमकल्पनेऽपि अन्तःकरणमनुपरतमास्त इति परिशेषासिद्धेर्न स्वयञ्ज्योतिष्ट्वविवेकः; मैवम्, 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वाद्' इत्यधिकरणे (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ३३) न्यायनिर्णयोक्तरीत्याऽन्तःकरणस्य चक्षुरादिकरणान्तरनिरपेक्षस्य ज्ञानसाधनत्वाभावाद्वा, तत्त्वप्रदीपिकोक्तरीत्या स्वप्ने तस्यैव गजाद्याकारेण परिणामेन ज्ञानकर्मतयाऽवस्थितत्वेन तदानीं ज्ञानसाधनत्वायोगाद्वा परिशेषोपपत्तेः ।

न च स्वप्नेऽन्तःकरणवृत्त्यभावे उत्थितस्य स्वप्नदृष्टगजाद्यनुसन्धानानुपपत्तिः; सुषुप्तिक्लृप्तया अविद्यावृत्त्या तदुपपत्तेः । सुषुप्तौ तदवस्थोपहितमेव स्वरूपचैतन्यमज्ञानसुखादिप्रकाशः उत्थितस्यानुसन्धानमुपाधिभूतावस्थाविनाशजन्यरूपसंस्कारेणेति वेदान्तकौमुद्यभिमते सुषुप्तावविद्या-


यदि शङ्का हो कि स्वप्नावस्थामें चक्षु आदिके उपरत होनेपर भी अन्तःकरण अनुपरत ही रहता है, इसलिए परिशेषकी — अवभासकान्तराभावकी — असिद्धि होनेसे आत्मामें स्वयंज्योतिष्ट्वकी हानि तो बनी ही है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्' * इस अधिकरणमें न्यायनिर्णयके कथनानुसार चक्षु आदि अन्य करणोंसे निरपेक्ष ज्ञानसाधनताका अभाव अन्तःकरणमें है, अर्थात् स्वप्नज्ञानका मन उपादान है, करण नहीं है, क्योंकि उपादान और करण एक नहीं होता है, यह भाव है। अथवा तत्त्वप्रदीपिकाके वचनके अनुसार स्वप्नमें अन्तःकरण ही गज आदिके आकारमें परिणत होता है, अतः ज्ञानकर्मत्वरूपसे अवस्थित अन्तःकरण स्वप्नावस्थामें ज्ञानसाधन हो ही नहीं सकता है ।

यदि शङ्का हो कि स्वप्नमें अन्तःकरणकी वृत्ति न मानी जाय, तो स्वप्नमें देखे गये गज आदिका अनुसन्धान नहीं होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें क्लृप्त अविद्यावृत्तिसे अनुसन्धानकी (स्मृतिकी) उपपत्ति हो सकती है । सुषुप्तिमें निद्रावस्थासे युक्त स्वरूपचैतन्य ही अज्ञान, सुख आदिका प्रकाश है, जागनेपर जो उनका स्मरण होता है, वह उपाधिभूत अवस्थाके विनाशसे उत्पन्न होनेवाले संस्कारसे ही


✡ आत्मा ही कर्ता है बुद्धि नहीं है, क्योंकि कर्ताके लिए अपेक्षित उपायोंका बोध करानेमें समर्थ विधिशास्त्र उपलब्ध होता है, यह सूत्रका अर्थ है । 'चक्षुरादीनां चैतन्येन विषय सम्बन्धार्थत्वात्' (ब्रह्मसूत्र शा० भा० १४७९ पृ० अच्युतग्रन्थमाला काशी मु०) इत्यादि न्यायनिर्णयकी पङ्क्ति है !

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