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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 384 of 590

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Page 384

३५४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


अत्राऽऽहुरत एवाऽत्र चाक्षुषत्वादिधीर्भ्रमः ॥

स्वप्नमें चक्षु आदिके व्यापारके न होनेसे स्वाप्न पदार्थोंमें चाक्षुषत्व आदिका ज्ञान भ्रमात्मक ही है, ऐसा कहते हैं ।

तस्मात् सर्वथाऽपि स्वप्ने चक्षुरादिव्यापारासम्भवात् स्वाप्नगजादौ चाक्षुषत्वाद्यनुभवो भ्रम एव ।

अन्वयव्यतिरेकादिकल्पनाऽप्यक्षिकल्पना ॥३८॥
असंभावितसाहस्रदर्शनात् स्वप्नदर्शने ॥
इत्थमेव हि शुक्त्यादौ रूप्याद्यध्यक्षधीगतिः ॥३९॥

स्वाप्न भ्रममें चक्षुके साथ ज्ञानका अन्वय-व्यतिरेक और चक्षु आदि कल्पित ही हैं, क्योंकि स्वप्नमें असम्भावित हजारों पदार्थ देखे जाते हैं, इसी प्रकारकी शुक्ति आदिमें रूप्य आदिके प्रत्यक्ष ज्ञानकी भी गति है ॥३८॥३९॥

ननु स्वप्नेऽपि चक्षुरुन्मीलने गजाद्यनुभवः, तन्निमीलने नेति जागर


स्मरण कोई बाधक नहीं है । .. इसपर शङ्का यह होती है कि स्वप्नमें अन्तःकरणके माननेपर 'अत्रायम्' इत्यादि श्रुतिसे आत्माका जो अवशेष कहा गया है वह बाधित होगा, तथा स्वयंज्योतिष्ट्व भी उपपन्न नहीं होगा है, परन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है, क्योंकि सर्वतोभावेन अन्तःकरणका जीवचैतन्यके साथ ऐक्य 'मैं देखता हूँ' इत्यादि रूपसे अध्यस्त होनेके कारण उसका द्रष्टृत्वरूपसे ग्रहण होता है, इसलिए अज्ञ पुरुषोंकी दृष्टिसे चिदात्माका अन्तःकरणसे भेद ही गृहीत नहीं होता है, अतः परिशेषके लिए लोकप्रसिद्ध द्रष्टृ भिन्न चक्षु आदिके व्यापारका अभाव ही अपेक्षित है, अन्तःकरणवृत्तिलक्षण व्यापारका द्रष्टाके व्यापाररूपसे ग्रहण होता है, अतः उसके रहनेपर भी परिशेषकी असिद्धि नहीं है ] ।

इससे स्वप्नमें किसी प्रकारसे भी चक्षु आदिके व्यापारका सम्भव न होनेके कारण स्वाप्न गज आदि पदार्थोंमें होनेवाला चाक्षुषत्वानुभव भ्रमात्मक ही है, यह भाव है ।

यदि शङ्का हो कि स्वप्नावस्थामें भी चक्षुके खोलनेपर स्वाप्न गज आदि पदार्थोंका अनुभव होता है, और चक्षुओंके बन्द करनेपर उन पदार्थोंका भान