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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 381 of 590

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Page 381

स्वाप्न पदार्थोंके अनुभवप्रकारका विचार] भाषानुवादसहित ३५१


सर्वाङ्गीणशीतस्पर्शानिर्वाहात् ।

अत एव 'स्वप्ने जाग्रदिन्द्रियाणामुपरतावपि तैजसव्यवहारोपयुक्तानि सूक्ष्मशरीरावयवभूतानि सूक्ष्मेन्द्रियाणि सन्तीति तैस्स्वाप्नपदार्थानामैन्द्रियकत्वम्, इत्युपपादनशङ्काऽपि निरस्ता । जाग्रदिन्द्रियव्यतिरिक्तसूक्ष्मेन्द्रियाप्रसिद्धेः ।

किञ्च, 'अत्रायं पुरुषः स्वयञ्ज्योतिः' इति जागरे आदित्यादिज्योतिर्व्यतिकराच्चक्षुरादिवृत्तिसञ्चाराच्च दुर्विचेकमात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वमिति स्वप्नावस्थामधिकृत्य तत्राऽऽत्मनः स्वयञ्ज्योतिष्ट्वं प्रतिपादयति । अन्यथा तस्य सर्वदा स्वयञ्ज्योतिष्ट्वेनाऽत्रेति वैयर्थ्यात् । तत्र यदि स्वप्नेऽपि चक्षुरादिवृत्तिसञ्चारः कल्प्येत, तदा तत्राऽपि जागर इव तस्य स्वयञ्ज्योतिष्ट्वं दुर्विनेचं स्यादित्युदाहृता श्रुतिः पीड्येत ।


स्पर्शेन्द्रियका—स्वाप्न शरीरका—एक देश—आश्रय—माना जाय, तो स्वाप्नजलमें अवगाहन करनेसे सम्पूर्ण अङ्गोंमें जो शैत्यका अनुभव होता है, उसका निर्वाह नहीं हो सकेगा ।

इसीसे 'स्वप्नमें जाग्रत् इन्द्रियोंके उपरत होनेपर भी तैजस और व्यवहारके लिए उपयुक्त सूक्ष्म शरीरके अवयवभूत सूक्ष्म इन्द्रियाँ हैं, इसलिए उन्हींसे स्वाप्न पदार्थोंका ऐन्द्रियकज्ञान होता है' इस प्रकारकी उपपादन-शङ्का भी निरस्त हुई, क्योंकि जाग्रत् इन्द्रियोंके समान उनसे भिन्न सूक्ष्म इन्द्रियाँ प्रसिद्ध नहीं हैं ।

किञ्च, 'अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिः' (स्वप्नावस्थामें पुरुष स्वयंज्योति-स्वप्रकाश है) यह श्रुति—जाग्रत् अवस्थामें आदित्य आदिके प्रकाशके सम्पर्कसे और चक्षु आदिकी वृत्तियोंका संचार होनेसे आत्मामें स्वयंप्रकाशत्वका निर्वचन अशक्य है, अतः स्वप्नावस्थाका अधिकार करके ही आत्मामें स्वयंज्योतिष्ट्वका—प्रतिपादन करती है, यदि वैसा न माना जाय, तो आत्माके सर्वदा स्वप्रकाश होनेके कारण श्रुतिमें उक्त 'अत्र' शब्द व्यर्थ होगा । उक्त प्रकारके अभिप्राय सिद्ध होनेपर यदि स्वप्नमें भी चक्षु आदिका संचार माना जाय, तो स्वप्नमें भी जाग्रत् अवस्थाके समान स्वयंज्योतिष्ट्वका निर्वचन अशक्य होनेसे उदाहृत श्रुतिके साथ विरोध प्रसक्त होगा ।