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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 380 of 590

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Page 380

३५० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

खानां विरामादग्राह्यप्रातिभासिकनिह्नवात् ।
स्वयञ्ज्योतिष्ट्ववादाच्च न स्वाप्नेन्द्रियकल्पना ॥ ३७ ॥

उक्त शङ्काके परिहारमें कहते हैं कि स्वप्नमें इन्द्रियोंके उपरत होनेसे, तथा अग्राह्य इन्द्रियोंके प्रातिभासिक न होनेसे और स्वयंप्रकाशत्वकी उक्ति होनेसे स्वाप्न इन्द्रियोंकी कल्पना नहीं है, अतः स्वाप्नपदार्थोंमें चाक्षुषत्वका भी भ्रम है ॥ ३७ ॥

उच्यते—न तावत् तत्समर्थनाय स्वाप्नदेहवद्विषयवच्च इन्द्रियाणामपि प्रातिभासिको विवर्तः शक्यते वक्तुम्, प्रातिभासिकस्याऽज्ञातसत्त्वा-भावात्। इन्द्रियाणां चातीन्द्रियाणां सत्त्वेऽज्ञातसत्त्वस्य वाच्यत्वात्। नापि व्यावहारिकाणामेवेन्द्रियाणां स्वस्वगोलकेभ्यो निष्क्रम्य स्वाप्न-देहमाश्रित्य स्वस्वविषयग्राहकत्वं वक्तुं शक्यते, स्वप्नसमये तेषां व्यापारराहित्यरूपोपरतिश्रवणात्। व्यावहारिकस्य स्पर्शनेन्द्रियस्य स्वो-चितव्यावहारिकदेशसम्पत्तिविधुरान्तःशरीरे स्वाधिकपरिमाणकृत्स्नस्वाप्न-शरीरव्यापित्वायोगाच्च। तदेकदेशाश्रयत्वे च तस्य स्वाप्नजलावगाहनजन्य-

चक्षुकी अपेक्षा शुक्तिरजतके लिए होती ही है, यह भाव है ]। परन्तु स्वाप्न गज आदिके चाक्षुषत्वका जो अनुभव होता है, उसका समर्थन कैसे किया जाता है ?

इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं—स्वाप्न प्रपञ्चमें चाक्षुषत्वका प्रतिपादन करनेके लिए स्वाप्न देह और विषयोंकी नाई इन्द्रियोंका भी प्राति-भासिक विवर्त नहीं मान सकते हैं, क्योंकि प्रातिभासिक पदार्थकी अज्ञात सत्ता नहीं मानी जाती है। अतीन्द्रिय इन्द्रियोंका यदि प्रातिभासिक विवर्त माना जाय, तो उनकी भी अज्ञात सत्ता ही कही जायगी, [ क्योंकि वे सर्वत्र व्यवहारमें अज्ञात सत्तावाली ही देखी जाती हैं।] और यह भी नहीं कह सकते हैं कि व्यावहारिक इन्द्रियाँ अपने अपने गोलकसे (स्थानसे) निकलकर स्वाप्न शरीरका आश्रय करके अपने-अपने विषयोंका ग्रहण करती हैं, क्योंकि स्वप्नके समयमें उनका व्यापार नहीं होता है अर्थात् स्वप्नमें इन्द्रियाँ उपरत रहती हैं, ऐसा श्रुतिमें कहा गया है और व्यावहारिक स्पर्शेन्द्रिय (त्वक्) का अपने उपयुक्त व्यावहारिक देशकी सम्पत्तिसे शून्य शरीरके भीतर अपनेसे अधिक परिमाण-वाले स्वाप्न शरीरमें व्यापित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है। यदि उस

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