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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 376 of 590

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Page 376
३४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अन्येऽनहमवच्छिन्नाविद्याविम्विताचिद्गतम् ।
तद्भास्यं तदधिष्ठानवृत्त्या मातरि तत्प्रथाम् ॥ ३२ ॥

अहङ्कारसे अवच्छिन्न अविद्यामें प्रतिबिम्बित चैतन्यमें ही स्वाप्नाध्यास होता है और उसीसे उसका प्रकाश होता है, प्रमातामें स्वप्नका प्रकाश, तो अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणवृत्तिकृत अभेदाभिव्यक्तिसे होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥३२॥

अन्ये त्वनवच्छिन्नचैतन्यं न वृत्त्यभिव्यक्तं सत् स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानम्, अशब्दमूलकानवच्छिन्नचैतन्यगोचरवृत्त्युदयासम्भवाद् अहङ्काराद्यवच्छिन्नचैतन्य एवाऽहमाकारवृत्त्युदयदर्शनात् । तस्मात् स्वतोऽपरोक्षमहङ्काराद्यनवच्छिन्नचैतन्यं तदधिष्ठानम् ।

अत एव संक्षेपशारीरके—( सं० शा० अ० १ श्लो० ४१ )
‘अपरोक्षरूपविषयभ्रमधीरपरोक्षमास्पदमपेक्ष्य भवेत् ।
मनसा स्वतो नयनतो यदि वा स्वपनभ्रमादिषु तथा प्रथितेः’ ॥
इति श्लोकेनाऽपरोक्षाध्यासापेक्षितमधिष्ठानापरोक्ष्यं क्वचित् स्वतः,


कुछ लोग कहते हैं कि अनवच्छिन्न चैतन्य वृत्तिद्वारा अभिव्यक्त होकर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, क्योंकि शास्त्रसे अतिरिक्त प्रमाणसे जन्य अनवच्छिन्नचैतन्यविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति हो ही नहीं सकती है, क्योंकि अहङ्कार, शरीर आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यविषयक ही अहमाकार वृत्तिकी उत्पत्ति देखी जाती है । इससे स्वतः अर्थात् वृत्तिके बिना अभिव्यक्त अपरोक्ष चैतन्य ही स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान है ।

स्वतः अपरोक्ष चैतन्यको स्वप्नाध्यासका अधिष्ठान स्वीकार करनेसे ही संक्षेपशारीरकमें—

‘अपरोक्ष०’ ( अपरोक्षरूप जो शुक्तिरजतादिविषयक भ्रमरूप बुद्धि है, अथवा अपरोक्ष रूप जो शुक्ति रजतादि, तद् विषयक भ्रमरूप जो बुद्धि है, वह अपरोक्ष अधिष्ठानकी अपेक्षा रखकर होती है, और यह अधिष्ठानापरोक्ष्य मनसे, स्वतः अथवा चक्षुसे होता है, क्योंकि स्वप्नभ्रममें अन्वय-व्यतिरेकसे वैसा ही देखा जाता है ) इस श्लोकसे अपरोक्षाध्यासके लिए अपेक्षित अधिष्ठानका आप-

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