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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 375 of 590

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Page 375

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवादसहित ३४५

अत्र केचिदाद्यपक्षं समर्थयन्ते—अहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यं न देहाद्वहिः स्वाप्नप्रपञ्चस्याऽधिष्ठानमुपेयते, किन्तु तदन्तरेव। अत एव दृश्यमानपरिमाणोचितदेशसम्पत्त्यभावात् स्वाप्नगजादीनां मायामयत्वमुच्यते। एवं चाऽन्तःकरणस्य देहाद्वहिरस्वातन्त्र्याज्जागरणे बाह्यशुक्तीदमंशादिगोचरवृत्त्युत्पादाय चक्षुराद्यपेक्षायामपि देहान्तरन्तःकरणस्य स्वतन्त्रस्य स्वयमेव वृत्तिसम्भवाद्देहान्तरन्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तस्याऽनवच्छिन्नचैतन्यस्याऽधिष्ठानत्वे न काचिदनुपपत्तिः। अत एत यथा जागरणे सम्प्रयोगजन्यवृत्त्यभिव्यक्तशुक्तीदमंशावच्छिन्नचैतन्यस्थिताऽविद्या रूप्याकारेण विवर्तते, तथा स्वप्नेऽपि देहस्याऽन्तरन्तःकरणवृत्तौ निद्रादिदोषोपहितायामभिव्यक्तचैतन्यस्थाविद्या अदृष्टोद्बोधितनानाविषयसंस्कारसहिता प्रपञ्चाकारेण विवर्ततामिति विवरणोपन्यासे भारतीतीर्थवचनमिति।

यहांपर कुछ लोग प्रथम पक्षका ही समर्थन करते हैं—अहङ्कारादिसे अनवच्छिन्न चैतन्य देहसे बाहर स्वाप्न प्रपञ्चका अधिष्ठान नहीं होता है, किन्तु देहके भीतर ही अधिष्ठान होता है। इसीसे अर्थात् आन्तर चैतन्यके अधिष्ठान होनेसे ही दृश्यमान परिमाणसे युक्त हाथी आदिका शरीरके भीतर उचित स्थान न होनेके कारण उनको सूत्रकार बादरायणने प्रातिभासिक कहा है। इस युक्तिके अनुसार आन्तर चैतन्यके स्वाप्नाध्यासाधिष्ठानत्वकी सिद्धि होनेपर यद्यपि देहके बाहर अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है, अतः जाग्रत् अवस्थामें बाह्य शुक्तिके इदमंशाकारवृत्तिको उत्पन्न करनेके लिए वह चक्षुकी अपेक्षा करता है, तथापि देहके अवान्तर प्रदेशमें अन्तःकरणकी स्वतन्त्रता होनेके कारण चक्षु आदिकी अपेक्षा न करके ही उसकी स्वतः वृत्ति हो सकती है, अतः देहके भीतर अन्तःकरणकी वृत्तिसे अभिव्यक्त अनवच्छिन्न चैतन्यको अधिष्ठान माननेपर भी कोई विरोध नहीं है। इसीसे—'जैसे जाग्रत् अवस्थामें सम्प्रयोगजन्य (इन्द्रियके सम्बन्धसे उत्पन्न) वृत्तिसे अभिव्यक्त शुक्तिके इदमंशसे अवच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या रजताकारसे परिणत होती है, वैसे ही स्वप्नमें भी निद्रा, पित्तोद्रेक आदि दोषोंसे उपहित देहके अवान्तर भागमें अन्तःकरणकी वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यमें रहनेवाली अविद्या, जो कि अदृष्टविशेषसे उद्बोधित अनेक विषयोंके संस्कारसे युक्त है, विचित्र प्रपञ्चके आकारमें परिणत होती है—इस प्रकारका विवरणोपन्यासमें भारतीतीर्थमुनिका वचन भी है।

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