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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 377 of 590

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Page 377

स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका विचार] भाषानुवाद सहित ३४७


क्वचिन्मानसवृत्त्या, क्वचिद् बहिरिन्द्रियवृत्त्येत्यभिधाय,

‘स्वतोऽपरोक्षा चितिरत्र विश्रमस्तथाऽपि रूपाकृतिरेव जायते ।
मनोनिमित्तं स्वपने मुहुर्मुहुर्विनाऽपि चक्षुर्विषयं स्वमास्पदम् ॥
मनोऽवगम्येऽप्यपरोक्षतावलात्तथाऽम्बरे रूपमुपोल्लिखन् भ्रमः ।
सितादिभेदैर्बहुधा समीक्ष्यते तथाऽक्षिगम्ये रजतादिविभ्रमे ॥’

इत्याद्यनन्तरश्लोकेन स्वप्नाध्यासे स्वतोऽधिष्ठानापरोक्ष्यमुदाहृतम् । न चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्यमात्रमावृतमिति वृत्तिमन्तरेण न तदभिव्यक्तिरिति वाच्यम्, ब्रह्मचैतन्यमेवावृतमविद्याप्रतिविम्वजीवचैतन्यमहङ्कारानवच्छिन्नमप्यनावृतमित्युपगमात् । एवं चाहङ्कारानवच्छिन्नचैतन्येऽध्यस्यमाने स्वाप्नगजादौ तत्समनियताधिष्ठानगोचरान्तःकरणादिवृत्तिकुता-

रोक्ष्य * कहीं स्वतः, कहीं मानसवृत्तिसे कहीं बहिरिन्द्रियजन्य वृत्तिसे उत्पन्न होता है, ऐसा कह कर ‘स्वतोऽपरोक्षा ०’ (यद्यपि स्वप्नाध्यासरूप भ्रमका स्वतः अपरोक्ष चैतन्य ही अधिष्ठान है, तथापि उस चैतन्यमें मनोगत बुद्धिवासनाके प्रभावसे चक्षुर्ग्राह्य बाह्य रूपादि आलम्बनके बिना अनेक विषयाकारोंसे युक्त वह भ्रम बार-बार उत्पन्न होता है, वैसे मनोगम्य आकाशमें अपरोक्षताके वलसे अपरोक्ष चिदात्माके साथ अभेदाभिव्यक्तिसे—रूपोल्लेखी विभ्रम होता है, वैसे ही चक्षुसे दिखनेवाले रजतादिविभ्रममें श्वेत आदि अनेक प्रकार देखे जाते हैं ।) इत्यादि अनन्तरके श्लोकोंसे स्वप्नाध्यासमें अधिष्ठानका आपरोक्ष्य ( प्रत्यक्ष ) स्वतः ही दिखलाया है । यदि शङ्का हो कि अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमात्र तो आवृत है, अतः वृत्तिके विना उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्रह्मचैतन्य ही आवृत्त है, और अविद्यामें प्रतिविम्बित अहङ्कारसे अनवच्छिन्न भी जीवचैतन्य अनावृत है, ऐसा स्वीकार किया गया है, इस अवस्थामें अर्थात् स्वतः अपरोक्ष जीवचैतन्यके अधिष्ठान होनेपर अहङ्कारानवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्यमान स्वप्नके गज आदि प्रपञ्चमें स्वाप्न प्रपञ्चके समनियत † अधिष्ठानविषयक अन्तःकरण आदिकी वृत्तियोंसे सम्पादित


* शुक्ति-रजत स्थलमें नयनसन्निकर्षसे अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, गगननीलत्वके अध्यासमें मनसे अधिष्ठानापरोक्ष्य है और स्वाप्नाध्यासमें स्वतः अधिष्ठानका आपरोक्ष्य है, यह भाव है ।
† जब गज आदिका अध्यास होता है, तब अधिष्ठानविषयक अन्तःकरणकी अविद्यावृत्ति उत्पन्न होती ही है, इसलिए स्वाप्न प्रपञ्चके अधिष्ठानभूत चैतन्यके साथ वृत्तियुक्त अन्तःकरणके

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