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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 343 of 590

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Page 343

उपजीव्य प्रत्यक्षसे श्रुतिका अवाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित ३१३


अपरे तु 'नेह नानास्ति' इति श्रुतेः सत्यत्वेन प्रपञ्चनिषेधे एव तात्पर्यम्, न स्वरूपेण । निषेधस्य स्वरूपाप्रतिक्षेपकत्वे तस्य तन्निषेधत्वा-
योगात् । तत्प्रतिक्षेपकत्वे प्रत्यक्षविरोधात् ।

न च सत्यत्वस्यापि 'सन् घटः' इत्यादिप्रत्यक्षसिद्धत्वाद् न तेनापि रूपेण निषेधो युक्त इति वाच्यम्, प्रत्यक्षस्य श्रुत्यविरोघाय सत्यत्वा-


कुछ लोग कहते हैं कि 'नेह नानास्ति किञ्चन' (ब्रह्ममें द्वैत प्रपञ्च नहीं है) इस श्रुतिका (ब्रह्ममें) प्रपञ्चका सत्यत्वरूपसे निषेधमें ही तात्पर्य है, प्रपञ्चके स्वरूपसे निषेधमें तात्पर्य नहीं है । यदि ब्रह्ममें प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध प्रतियोगीका प्रतिक्षेपक—विरोधी न माना जाय, तो वह प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध ही नहीं रहेगा । यदि निषेध प्रतियोगीका विरोधी माना जाय, तो प्रत्यक्षविरोध होगा, [इससे प्रपञ्चके अधिकरणीभूत ब्रह्ममें प्रपञ्चका स्वरूपसे निषेध श्रुति नहीं करती है, किन्तु प्रपञ्चका सत्यत्वरूपसे निषेध करती है, अतः प्रतियोगी और अभावके भिन्नाधिकरण होनेसे, कोई दोष नहीं है, यह तात्पर्यार्थ है] ।

  • यदि शङ्का हो कि 'घटः सन्' (घट सत् है) इत्यादि प्रत्यक्षसे घटादि-प्रपञ्चमें भी सत्यत्व सिद्ध है, अतः सत्यत्वरूपसे भी प्रपञ्चका निषेध नहीं कर सकते हैं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिके साथ विरोध न हो, इसलिए सत्यत्वाभासरूप व्यावहारिक सत्यत्व ही 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षका विषय है ।

• इस ग्रन्थका तात्पर्यार्थ यह है कि ब्रह्ममें जैसे प्रपञ्च प्रत्यक्षसिद्ध है, वैसे प्रपञ्चमें सत्यत्व भी 'घटः सन्' इत्यादिसे प्रत्यक्षसिद्ध है, इससे निषेधश्रुतिका तात्पर्य प्रपञ्चके सत्यत्वके निषेधमें भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रपञ्चमें सत्यत्व है और उसीमें उसका निषेध करना है, अतः निषेध और प्रतियोगीकी अवस्थिति एकत्र हो जानेके कारण निषेधत्वका पूर्वोक्त रीतिसे व्याघात ही होगा, इसपर उत्तर देते हैं कि घट आदिमें जिस सत्यत्वका प्रत्यक्ष होता है, वह ब्रह्माप्रत्यक्षके समान पारमार्थिक नहीं है, किन्तु व्यावहारिक सत्यत्वरूप है, ऐसी कल्पना की जाती है, इसलिए उक्त दोष नहीं है, क्योंकि प्रपञ्चमें व्यावहारिक सत्यत्वका निषेध नहीं करते हैं, किन्तु पारमार्थिकत्वका ही निषेध करते हैं, इसलिए शुक्तिमें जो रजतका निषेध किया जाता है, वह सत्यरजतका ही निषेध किया जाता है, कल्पित रजतका निषेध नहीं किया जाता है, क्योंकि इस मतमें शुक्त्यादिमें कल्पित रजतादिका निषेध नहीं माना जाता है, किन्तु देशान्तरस्थ सत्य रजतादिका ही निषेध किया जाता है, इसीमें 'अत एव' इत्यादि ग्रन्थसे युक्ति दी गई है, और इस मतमें सत्ताके त्रैविध्यका अङ्गीकार भी है।

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